BREAKING JOBS
Latest agriculture job notificationsCheck current notices and closing dates
All job notices ↗
–

AGF 311 Lecture 04: भारत की कृषि-जैव विविधता संरक्षण हेतु पारंपरिक कृषि वानिकी; कृषि वानिकी प्रणाली का प्रबंधन | Hindi Notes

Agro Path Finder official logoAGRO PATH FINDER
AGF 311 · Introductory Agroforestry
विषय सूची · Quick Navigation02 अधिगम उद्देश्य (Learning Objectives)03 प्रस्तावना एवं मूल अवधारणा (Introduction)04 महत्वपूर्ण वैज्ञानिक परिभाषाएँ (Important Definitions)05 विस्तृत विषय व्याख्या (Detailed Topic Explanation)06 प्रकार एवं वैज्ञानिक वर्गीकरण (Types and Classification)07 महत्वपूर्ण सिद्धांत एवं समीकरण (Important Principles and Concepts)08 वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक उदाहरण व गणनाएँ (Scientific & Practical Examples)09 तुलनात्मक सारणियाँ (Comparative Tables)10 महत्वपूर्ण सूत्र एवं तकनीकी मानक (Formulas & Key Metrics)11 व्याख्यान-विशिष्ट माइंड मैप (Lecture-Specific Mind Map)12 प्रक्रिया प्रवाह चित्र एवं आरेख (Flowcharts & Visual Diagrams)13 महत्वपूर्ण तथ्य एवं परीक्षा टिप्स (Important Facts & Exam Tips)14 त्वरित पुनरावृत्ति सारांश (Quick Revision Panel)15 बहुविकल्पीय प्रश्न — उत्तर एवं व्याख्या सहित (10 MCQs with Answers)16 अति-लघु, लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न व वन-लाइनर्स (Exam Question Bank)
Lecture 04 Source Page Reference in Supplied Pack: 133 (AGF 311 Theory Lecture 04)

Lecture 04: भारत की कृषि-जैव विविधता संरक्षण हेतु पारंपरिक कृषि वानिकी; कृषि वानिकी प्रणाली का प्रबंधन

Traditional agroforestry as a viable choice to conserve agro biodiversity of India; Management of agro-forestry system

02 अधिगम उद्देश्य (Learning Objectives)

इस व्याख्यान (Lecture) के अध्ययन के पश्चात् विद्यार्थी निम्नलिखित में सक्षम होंगे:

  1. भारत की प्रमुख पारंपरिक कृषि वानिकी प्रणालियों—केरल व असम के बहु-स्तरीय होमगार्डन, राजस्थान की खेजड़ी व ओरण प्रणाली, तौंग्या (Taungya) प्रणाली, पूर्वोत्तर की झूम व एल्डर प्रणाली तथा तमिलनाडु की कांगायम प्रणाली—का अध्ययन करना।
  2. भारत की कृषि-जैव विविधता (Agro-biodiversity) के ‘सर्का-सीटू’ (Circa-situ / On-farm) संरक्षण और पारिस्थितिक गलियारे (Landscape connectivity) के रूप में पारंपरिक कृषि वानिकी की भूमिका को समझना।
  3. कृषि वानिकी प्रणाली में भूमि के ऊपर छत्र/प्रकाश प्रबंधन (Canopy Management) की 5 प्रमुख तकनीकों—प्रूनिंग (Pruning), पोलार्डिंग (Pollarding), लोपिंग (Lopping), कॉपिसिंग (Coppicing) और थिनिंग (Thinning)—में अंतर और अनुप्रयोग समझना।
  4. भूमि के नीचे जड़ प्रतिस्पर्धा नियंत्रण (Below-ground Root Management) की तकनीकों—रूट ट्रेंचिंग (Root trenching: 30–50 cm चौड़ी व 60–100 cm गहरी खाई), गहरी जुताई और कॉलर रिंगिंग—को समझना।

03 प्रस्तावना एवं मूल अवधारणा (Introduction)

मूल सामग्री (Core Course Content): भारत में कृषि वानिकी हजारों वर्षों से किसानों की जीवनशैली का अभिन्न अंग रही है। आधुनिक एकल-फसल (Monoculture) खेती के कारण जहाँ देशी फसलों की किस्में, चारा वृक्ष और लाभदायक कीट-पक्षी तेजी से विलुप्त हो रहे हैं, वहीं पारंपरिक कृषि वानिकी प्रणालियाँ (Traditional Agroforestry Systems) भारत की समृद्ध कृषि-जैव विविधता (Agro-biodiversity) के संरक्षण के लिए सबसे व्यावहारिक एवं टिकाऊ विकल्प (Viable choice) सिद्ध हुई हैं।

इसके साथ ही, खेत में वृक्ष और फसल से अधिकतम संयुक्त उपज (I=F−C>0) लेने के लिए वृक्ष के छत्र (Canopy) और जड़ तंत्र (Root system) का समयबद्ध वैज्ञानिक प्रबंधन (Management of Agroforestry System) करना अत्यंत आवश्यक है ताकि फसलों को प्रकाश, जल और पोषक तत्वों की कमी न हो।

04 महत्वपूर्ण वैज्ञानिक परिभाषाएँ (Important Definitions)

कृषि-जैव विविधता (Agro-biodiversity)
कृषि पारिस्थितिकी तंत्र में पाए जाने वाले सभी पौधों (फसल किस्में, बहुउद्देशीय वृक्ष, चारा घास, औषधीय पौधे), पशुधन नस्लों, मृदा सूक्ष्मजीवों और परागणकर्ताओं/प्राकृतिक शत्रुओं की कुल विविधता।
तौंग्या प्रणाली (Taungya System – Dietrich Brandis, 1856/1890)
‘Taungya’ बर्मी (म्यांमार) भाषा का शब्द है (Taung = पहाड़ी/Hill, Ya = खेती/Cultivation)। इसे 1856 में म्यांमार में डॉ. डाइट्रिच ब्रैंडिस (Dietrich Brandis) ने शुरू किया और भारत में प्रथम तौंग्या वृक्षारोपण 1890 में उत्तरी बंगाल (और 1896 में सागवान हेतु) में हुआ। इसमें वन भूमि पर वृक्षारोपण के प्रारंभिक 2–4 वर्षों तक कतारों के बीच भूमिहीन किसानों को कृषि फसलें उगाने की अनुमति दी जाती है।
पोलार्डिंग (Pollarding)
वृक्ष के मुख्य तने के शीर्ष को भूमि स्तर से लगभग 2.0 मीटर (या पशुओं की पहुँच/Browsing height से ऊपर) की ऊँचाई पर काट देना ताकि वहाँ से नई घनी प्ररोह शाखाएँ (Shoots) फूटें। (उदाहरण: Salix, Hardwickia binata, Morus alba)।
कॉपिसिंग (Coppicing)
वृक्ष के मुख्य तने को भूमि स्तर के बिल्कुल पास (15 से 30 cm ऊँचाई पर) काट देना ताकि ठूंठ (Stump/Stool) की अपस्थानिक कलिकाओं से नए प्ररोह निकलें। (उदाहरण: Eucalyptus, Tectona grandis, Dalbergia sissoo, Leucaena)।
लोपिंग (Lopping)
चारा या जलाऊ लकड़ी प्राप्त करने और नीचे की फसलों पर छाया कम करने के लिए वृक्ष की पार्श्व शाखाओं (Side branches) या टहनियों को अनियमित या चयनात्मक रूप से काटना। (उदाहरण: जाड़ों में खेजड़ी की लूंग हेतु लोपिंग)।
प्रूनिंग (Pruning)
गाँठ-मुक्त सीधी इमारती लकड़ी (Knot-free clean bole) प्राप्त करने और छत्र को नियंत्रित करने के लिए मुख्य तने से निचली जीवित या सूखी पार्श्व शाखाओं को तने के बिल्कुल पास से व्यवस्थित रूप से काटना।
रूट ट्रेंचिंग (Root Trenching)
वृक्षों की उथली पार्श्व जड़ों को कृषि फसल के क्षेत्र में प्रवेश करने से रोकने के लिए वृक्ष की कतार से 1.0 से 1.5 मीटर की दूरी पर 30–50 cm चौड़ी और 60–100 cm गहरी खाई (Trench) खोदना।

05 विस्तृत विषय व्याख्या (Detailed Topic Explanation)

1. भारत की प्रमुख पारंपरिक कृषि वानिकी प्रणालियाँ एवं जैव-विविधता संरक्षण

1. उष्णकटिबंधीय गृह वाटिकाएँ (Tropical Homegardens — केरल, असम, अंडमान)

• इन्हें ‘जैव-विविधता के हॉटस्पॉट’ कहा जाता है। केरल की मात्र 0.2–0.5 हेक्टेयर की गृह वाटिका में 3 से 4 ऊर्ध्वाधर स्तरों (Multi-tiers) में 30 से 120 से अधिक पादप प्रजातियाँ (नारियल, सुपारी, कटहल, आम, केला, काली मिर्च, इलायची, हल्दी, अदरक, सब्जियाँ व औषधीय पौधे) संरक्षित रहती हैं।
• ये देशी लैंडरेस (Landraces) और जंगली फसल संबंधियों के ‘इन-सीटू / ऑन-फार्म संरक्षण’ (In-situ / Circa-situ conservation) का सर्वोत्तम माध्यम हैं।

2. राजस्थान की खेजड़ी एवं ओरण/गोचर प्रणाली (Arid Khejri & Oran System)

• थार मरुस्थल में किसान अपने खेतों में खेजड़ी (Prosopis cineraria), रोहिड़ा, बोरड़ी (Ziziphus nummularia) और केर (Capparis decidua) को प्राकृतिक रूप से संरक्षित रखते हैं और उनके नीचे बाजरा, मोठ, ग्वार व तिल उगाते हैं।
• सामुदायिक पवित्र उपवन ‘ओरण’ (Oran) और ‘गोचर’ मरुस्थलीय वनस्पतियों, सेवण घास और चिंकारा/गोडावण जैसे वन्यजीवों की जैव-विविधता के जीवंत बैंक हैं।

3. तौंग्या प्रणाली (Taungya System — Departmental, Leased & Village)

• 1890 में भारत (उत्तरी बंगाल) में और 1923 में गोरखपुर (उ.प्र. में साल व सागवान हेतु) में प्रचलित।
• इसके 3 प्रकार हैं: (i) Departmental Taungya (वन विभाग स्वयं वेतनभोगी श्रमिकों से फसल उगवाता है), (ii) Leased Taungya (सर्वाधिक बोली लगाने वाले को पट्टे पर भूमि), और (iii) Village Taungya (सबसे सफल — वन ग्राम के स्थायी किसानों को 1–2 ha भूमि दी जाती है)।

4. कांगायम एवं एल्डर प्रणालियाँ (Kangeyam & Alder Systems)

• कांगायम सिल्वा-पाश्चर प्रणाली (तमिलनाडु): Acacia leucophloea (रेऊंजा/श्वेत बबूल) + Cenchrus glaucus (कोल्लूकाट्टई घास) + कांगायम नस्ल के मवेशी।
• नागालैंड की ज़ाबो (Zabo) एवं एल्डर (Alnus nepalensis) प्रणाली: झूम खेती के परती चक्र को छोटा करने और मृदा उर्वरता व जैव-विविधता बचाने में सहायक।

जैव-विविधता संरक्षण के 4 पारिस्थितिक तंत्र (Mechanisms of Biodiversity Conservation): (1) वनों की कटाई (Deforestation) और दबाव में कमी, (2) खंडित वनों के बीच वन्यजीवों के आवागमन हेतु पारिस्थितिक गलियारे (Ecological corridors & landscape connectivity) प्रदान करना, (3) मृदा सूक्ष्मजीवों, पक्षियों व मधुमक्खियों को आवास देना, और (4) देशी वृक्ष व फसल जर्मप्लाज्म का संरक्षण।

2. कृषि वानिकी प्रणाली का वैज्ञानिक प्रबंधन (Management of Agroforestry System)

वृक्ष और फसल के बीच संसाधन (प्रकाश, जल, पोषक तत्व) प्रतिस्पर्धा को कम करने और भूमि समतुल्य अनुपात (LER) को अधिकतम करने के लिए प्रबंधन को दो भागों में बाँटा जाता है:

(A) भूमि के ऊपर छत्र / प्रकाश प्रबंधन (Above-ground Canopy Management)
  1. प्रूनिंग / कृंतन (Pruning): मुख्य तने के निचले 1/3 से 1/2 भाग की पार्श्व शाखाओं को तने के बिल्कुल पास (Flush with stem) से काटना। इससे गाँठ-मुक्त इमारती लकड़ी (Knot-free timber) मिलती है और फसलों पर तिरछी धूप आसानी से पहुँचती है (जैसे—पॉपलर और सागवान में)।
  2. लोपिंग / छँगाई (Lopping): चारे और ईंधन के लिए वृक्ष की ऊपरी और पार्श्व टहनियों को काटना। राजस्थान में खेजड़ी और हिमालय में भीमल की लोपिंग शीतकाल (नवंबर-दिसंबर) में की जाती है जिससे रबी फसलों को पूरी धूप मिलती है। (नियम: छत्र के ऊपरी 1/3 भाग को सुरक्षित छोड़ना चाहिए और 2–3 वर्ष से कम आयु के पौधों की लोपिंग नहीं करनी चाहिए)।
  3. पोलार्डिंग (Pollarding): वृक्ष के मुख्य तने को जमीन से 2.0 मीटर की ऊँचाई पर काट देना ताकि पशुओं की चराई पहुँच (Browsing reach) से ऊपर नए प्ररोहों का घना छत्र विकसित हो। यह Hardwickia binata (अंजन वृक्ष), Salix (विलो), Morus alba (शहतूत) और Gliricidia में अत्यंत लोकप्रिय है।
  4. कॉपिसिंग (Coppicing): वृक्ष को जमीन के पास (15 से 30 cm ऊँचाई पर तिरछा कट ताकि वर्षा का पानी ठूंठ पर न रुके) काट देना। एलै क्रॉपिंग में Leucaena leucocephala की हेजरो को 30–50 cm पर बार-बार कॉपिस/प्रून किया जाता है।
  5. थिनिंग (Thinning — विरलन): जब वृक्ष बड़े होकर आपस में और फसलों पर अत्यधिक छाया करने लगते हैं, तो कुल वृक्षों में से कमजोर या अतिरिक्त वृक्षों (जैसे 25% से 50% वृक्ष) को हटाकर अंतराल बढ़ाया जाता है।
  6. वृक्ष कतार की दिशा (Row Orientation): कृषि वानिकी में वृक्षों की कतारें सदैव पूर्व से पश्चिम (East-West direction) में लगानी चाहिए ताकि सूर्य के पूर्व से पश्चिम गमन के दौरान बीच की फसल पट्टी पर न्यूनतम छाया पड़े।
(B) भूमि के नीचे जड़ प्रबंधन (Below-ground Root Management)
  1. रूट ट्रेंचिंग (Root Trenching / खाई खोदना): वृक्षों की कतार के दोनों ओर तने से 1.0 से 1.5 मीटर की दूरी पर 30–50 cm चौड़ी और 60–100 cm गहरी खाई (Trench) खोदकर सतही पार्श्व जड़ों (Lateral feeder roots) को काट दिया जाता है। इससे वृक्ष अपनी गहरी जड़ों से पानी लेने के लिए बाध्य होता है और फसल क्षेत्र में नमी स्पर्धा समाप्त हो जाती है।
  2. गहरी जुताई (Deep Ploughing / Sub-soiling): मानसून से पहले खेत की गहरी जुताई (20–30 cm) करने से वृक्षों की ऊपरी परत में आने वाली बारीक जड़ें स्वतः कट जाती हैं।
  3. रूट बैरियर (Root Barriers): खाई में पॉलीथीन शीट या जीआई शीट लगाकर जड़ों का फैलाव रोकना।

06 प्रकार एवं वैज्ञानिक वर्गीकरण (Types and Classification)

कृषि वानिकी प्रबंधन तकनीकों का वर्गीकरण:

  • 1. छत्र प्रबंधन (Canopy / Light Management): Pruning (शाखा कृंतन), Lopping (टहनी छँगाई), Pollarding (2 m पर शीर्ष कर्तन), Coppicing (15-30 cm पर आधार कर्तन), Thinning (विरलन) एवं Bending।
  • 2. जड़ प्रबंधन (Root / Water-Nutrient Management): Deep ploughing (गहरी जुताई), Root trenching (60-100 cm गहरी खाई), Root barriers एवं स्थानीयकृत उर्वरक/ड्रिप सिंचाई।

07 महत्वपूर्ण सिद्धांत एवं समीकरण (Important Principles and Concepts)

  • पोलार्डिंग बनाम कॉपिसिंग का शरीर-क्रियात्मक सिद्धांत: कॉपिसिंग में कट जमीन के पास (15–30 cm) लगाया जाता है इसलिए नए कोमल प्ररोहों को मवेशी आसानी से चर सकते हैं; जबकि पोलार्डिंग में कट 2 मीटर की ऊँचाई पर लगाया जाता है जिससे नए प्ररोह पशुओं की पहुँच (Browsing height) से सुरक्षित रहते हैं और नीचे फसल को धूप भी मिल जाती है।

08 वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक उदाहरण व गणनाएँ (Scientific & Practical Examples)

व्यावहारिक उदाहरण: खेजड़ी की शीतकालीन लोपिंग और पॉपलर में प्रूनिंग
  • खेजड़ी में लोपिंग (राजस्थान): पश्चिमी राजस्थान में किसान नवंबर-दिसंबर में खेजड़ी के वृक्षों की लोपिंग (छँगाई) करके पत्तियों का चारा (‘लूंग’) एकत्र कर लेते हैं। इससे सर्दियों में रबी की फसल (गेहूँ/सरसों/चना) को पूरी धूप मिलती है और मई-जून की भीषण गर्मी आते-आते खेजड़ी में पुनः हरा छत्र आ जाता है।
  • पॉपलर में प्रूनिंग (उत्तर भारत): पॉपलर के वृक्षों में प्रथम वर्ष के बाद निचले 1/3 से 1/2 तने की शाखाओं की प्रूनिंग बोरडो पेस्ट लगाकर की जाती है ताकि प्लाईवुड उद्योग के लिए बिना गाँठ वाला सीधा तना मिले।

09 तुलनात्मक सारणियाँ (Comparative Tables)

तुलनात्मक सारणी 4.1: कॉपिसिंग (Coppicing), पोलार्डिंग (Pollarding), लोपिंग (Lopping) एवं प्रूनिंग (Pruning) की तुलना
प्रबंधन क्रिया (Operation) काटे जाने वाले भाग एवं ऊँचाई मुख्य उद्देश्य (Primary Objective) प्रमुख उपयुक्त वृक्ष प्रजातियाँ
1. कॉपिसिंग (Coppicing) मुख्य तने को भूमि के पास (15–30 cm ऊँचाई) पर काटना। ठूंठ से नए तने उगाकर ईंधन, लुगदी, खंभे व हरी खाद प्राप्त करना। Eucalyptus, Tectona grandis, Dalbergia sissoo, Leucaena
2. पोलार्डिंग (Pollarding) मुख्य तने के शीर्ष को ~2.0 मीटर ऊँचाई पर काटना। पशु चराई से ऊपर नए प्ररोह (चारा/टहनियाँ) प्राप्त करना व छाया घटाना। Hardwickia binata, Salix alba, Morus alba, Gliricidia
3. लोपिंग (Lopping) पार्श्व शाखाओं व हरी टहनियों को चयनात्मक रूप से काटना। पशुओं के लिए हरा पत्ती चारा (Top feed) व जलाऊ लकड़ी लेना तथा धूप बढ़ाना। Prosopis cineraria (खेजड़ी), Ailanthus excelsa, Grewia optiva
4. प्रूनिंग (Pruning) तने के निचले भाग की पार्श्व शाखाओं को तने के बिल्कुल पास से काटना। गाँठ-मुक्त सीधा इमारती तना (Knot-free clean bole) प्राप्त करना। Populus deltoides (पॉपलर), Tectona grandis, Melia dubia

10 महत्वपूर्ण सूत्र एवं तकनीकी मानक (Formulas & Key Metrics)

महत्वपूर्ण प्रबंधन मानक एवं ऐतिहासिक वर्ष (Key Management Standards)
  • तौंग्या प्रणाली (Taungya System): प्रतिपादक = डॉ. डाइट्रिच ब्रैंडिस (Dr. Dietrich Brandis, 1856 म्यांमार)  |  भारत में प्रथम तौंग्या = 1890 (उत्तरी बंगाल)
  • कॉपिसिंग कट की मानक ऊँचाई: भूमि स्तर से 15 से 30 cm ऊपर (तिरछा कट)
  • पोलार्डिंग कट की मानक ऊँचाई: भूमि स्तर से ≈2.0 मीटर ऊपर (पशुओं की पहुँच से ऊपर)
  • रूट ट्रेंचिंग (Root Trench) आकार: चौड़ाई = 30–50 cm,   गहराई = 60–100 cm (वृक्ष कतार से 1.0–1.5 m दूरी पर)
  • आदर्श वृक्ष कतार अभिविन्यास (Row Orientation): पूर्व-पश्चिम दिशा (East–West Direction) (फसलों को अधिकतम धूप हेतु)

11 व्याख्यान-विशिष्ट माइंड मैप (Lecture-Specific Mind Map)

Lecture 04 Mind Map: पारंपरिक कृषि वानिकी (जैव-विविधता संरक्षण) एवं छत्र/जड़ प्रबंधन
  • पारंपरिक कृषि वानिकी एवं प्रणाली प्रबंधन (Agro-biodiversity Conservation & Canopy/Root Management)
    • भारत की पारंपरिक प्रणालियाँ व जैव-विविधता (Traditional Systems)
      • होमगार्डन (केरल/असम): 3-4 स्तर, 30–120+ प्रजातियाँ, इन-सीटू/ऑन-फार्म जर्मप्लाज्म संरक्षण
      • शुष्क खेजड़ी व ओरण (राजस्थान): खेजड़ी + बाजरा तथा पवित्र ओरण/गोचर चारागाह संरक्षण
      • तौंग्या (Taungya – Brandis 1856 / भारत 1890): Departmental, Leased एवं Village Taungya
      • अन्य: तमिलनाडु की कांगायम प्रणाली (Acacia leucophloea + Cenchrus) एवं पूर्वोत्तर की एल्डर/ज़ाबो प्रणाली
    • भूमि के ऊपर छत्र प्रबंधन (Above-Ground Canopy Management)
      • कॉपिसिंग (Coppicing): 15–30 cm ऊँचाई पर आधार कर्तन (सफेदा, सागवान, सुबबूल)
      • पोलार्डिंग (Pollarding): 2.0 m ऊँचाई पर शीर्ष कर्तन (विलो, अंजन, शहतूत)
      • लोपिंग (Lopping) व प्रूनिंग (Pruning): चारे हेतु टहनी छँगाई (खेजड़ी) एवं गाँठ-मुक्त तने हेतु प्रूनिंग (पॉपलर)
      • कतार दिशा व थिनिंग: पूर्व-पश्चिम (East-West) पंक्ति अभिविन्यास एवं विरलन
    • भूमि के नीचे जड़ प्रबंधन (Below-Ground Root Management)
      • रूट ट्रेंचिंग (Trenching): 30–50 cm चौड़ी व 60–100 cm गहरी खाई खोदकर पार्श्व जड़ें काटना + गहरी जुताई

12 प्रक्रिया प्रवाह चित्र एवं आरेख (Flowcharts & Visual Diagrams)

प्रक्रिया प्रवाह चित्र (Process Flowchart): कृषि वानिकी में वृक्ष-फसल प्रतिस्पर्धा कम करने हेतु एकीकृत प्रबंधन चक्र
1. रोपण डिजाइन
(पूर्व-पश्चिम कतार व उचित अंतराल)
➔ 2. प्रूनिंग (1/3 से 1/2 तना)
(गाँठ-मुक्त सीधा तना व तिरछी धूप)
➔ 3. मौसमी लोपिंग / पोलार्डिंग
(फसल बुवाई पूर्व छत्र हल्का करना + चारा)
➔ 4. रूट ट्रेंचिंग / गहरी जुताई
(60–100 cm खाई से सतही जड़ें काटना)
➔ 5. अधिकतम संयुक्त उपज
(उच्च LER > 1.0 एवं टिकाऊ उत्पादन)

13 महत्वपूर्ण तथ्य एवं परीक्षा टिप्स (Important Facts & Exam Tips)

  • पोलार्डिंग (Pollarding) और कॉपिसिंग (Coppicing) में ऊँचाई का अंतर परीक्षा में अवश्य पूछा जाता है: कॉपिसिंग में तने को जमीन के पास (15–30 cm) काटा जाता है, जबकि पोलार्डिंग में पशुओं की पहुँच से ऊपर लगभग 2 मीटर की ऊँचाई पर काटा जाता है।
  • तौंग्या (Taungya) प्रणाली का प्रतिपादन 1856 में म्यांमार (बर्मा) में डॉ. डाइट्रिच ब्रैंडिस (Dr. Dietrich Brandis – भारत के प्रथम महानिरीक्षक वन) ने किया था और भारत में यह सर्वप्रथम 1890 में उत्तरी बंगाल में शुरू हुई।
  • तौंग्या के तीनों प्रकारों (Departmental, Leased, Village) में ‘विलेज तौंग्या’ (Village Taungya) सबसे अधिक सफल और लोकप्रिय रहा है।
  • फसलों पर वृक्षों की छाया को न्यूनतम करने के लिए वृक्षों की कतारें हमेशा ‘पूर्व-पश्चिम दिशा’ (East-West direction) में लगानी चाहिए।
  • तमिलनाडु की प्रसिद्ध पारंपरिक ‘कांगायम सिल्वा-पाश्चर प्रणाली’ में Acacia leucophloea वृक्ष के साथ Cenchrus glaucus घास उगाई जाती है।

14 त्वरित पुनरावृत्ति सारांश (Quick Revision Panel)

  • तौंग्या (Taungya): बर्मी शब्द (Taung = पहाड़ी, Ya = खेती) | ब्रैंडिस (1856) | भारत में 1890 (उत्तरी बंगाल)।
  • छत्र प्रबंधन: Coppicing (15–30 cm), Pollarding (~2.0 m), Lopping (चारे हेतु शाखा छँगाई), Pruning (गाँठ-मुक्त इमारती तना)।
  • जड़ प्रबंधन: Root Trenching (30–50 cm चौड़ी, 60–100 cm गहरी खाई) एवं Deep Ploughing।
  • कतार अभिविन्यास: पूर्व-पश्चिम (East–West) दिशा।

15 बहुविकल्पीय प्रश्न — उत्तर एवं व्याख्या सहित (10 MCQs with Answers)

1. वृक्ष के मुख्य तने को पशुओं की चराई पहुँच से ऊपर (भूमि से लगभग 2.0 मीटर की ऊँचाई पर) काटकर नए प्ररोह प्राप्त करने की क्रिया क्या कहलाती है?
(A) कॉपिसिंग (Coppicing)
(B) पोलार्डिंग (Pollarding)
(C) थिनिंग (Thinning)
(D) ट्रेंचिंग (Trenching)
उत्तर एवं व्याख्या देखें (Show Answer & Explanation)
सही उत्तर (Answer): (B) पोलार्डिंग (Pollarding)
वैज्ञानिक व्याख्या (Explanation): पोलार्डिंग में तने के शीर्ष को लगभग 2 मीटर ऊँचाई पर काटा जाता है, जबकि कॉपिसिंग में जमीन के बिल्कुल पास (15–30 cm) काटा जाता है।
2. ‘तौंग्या प्रणाली’ (Taungya System) का प्रतिपादन 1856 में बर्मा (म्यांमार) में किसने किया था और भारत में यह कब प्रारंभ हुई?
(A) पी.के.आर. नायर (1985)
(B) डॉ. डाइट्रिच ब्रैंडिस (1856 में प्रतिपादन; 1890 में उत्तरी बंगाल, भारत में प्रारंभ)
(C) जे.बी. रेनट्री (1987)
(D) एम.एस. स्वामीनाथन (1966)
उत्तर एवं व्याख्या देखें (Show Answer & Explanation)
सही उत्तर (Answer): (B) डॉ. डाइट्रिच ब्रैंडिस (1856 में प्रतिपादन; 1890 में उत्तरी बंगाल, भारत में प्रारंभ)
वैज्ञानिक व्याख्या (Explanation): डॉ. डाइट्रिच ब्रैंडिस ने 1856 में म्यांमार में सागवान के साथ तौंग्या प्रणाली शुरू की और भारत में यह 1890 में उत्तरी बंगाल में शुरू हुई।
3. गाँठ-मुक्त सीधी इमारती लकड़ी (Knot-free clean bole) प्राप्त करने के लिए मुख्य तने से निचली पार्श्व शाखाओं को तने के बिल्कुल पास से हटाने की क्रिया क्या कहलाती है?
(A) लोपिंग (Lopping)
(B) प्रूनिंग (Pruning)
(C) कॉपिसिंग (Coppicing)
(D) गर्डलिंग (Girdling)
उत्तर एवं व्याख्या देखें (Show Answer & Explanation)
सही उत्तर (Answer): (B) प्रूनिंग (Pruning)
वैज्ञानिक व्याख्या (Explanation): प्रूनिंग (कृंतन) का मुख्य उद्देश्य पॉपलर व सागवान जैसे इमारती वृक्षों में गाँठ-मुक्त साफ तना (Clean bole) तैयार करना और प्रकाश प्रवेश बढ़ाना है।
4. कृषि वानिकी में बीच में उगाई जाने वाली फसलों को अधिकतम सौर प्रकाश (Sunlight) उपलब्ध कराने के लिए वृक्षों की कतारें किस दिशा में लगानी चाहिए?
(A) उत्तर-दक्षिण दिशा (North-South)
(B) पूर्व-पश्चिम दिशा (East-West)
(C) केवल गोलाकार
(D) किसी भी अनियमित दिशा में
उत्तर एवं व्याख्या देखें (Show Answer & Explanation)
सही उत्तर (Answer): (B) पूर्व-पश्चिम दिशा (East-West)
वैज्ञानिक व्याख्या (Explanation): सूर्य पूर्व से पश्चिम की ओर चलता है, इसलिए पूर्व-पश्चिम दिशा में कतारें लगाने से वृक्षों की छाया कतार के ऊपर ही पड़ती है और बीच की फसल को पूरी धूप मिलती है।
5. वृक्षों की उथली पार्श्व जड़ों को कृषि फसल के क्षेत्र में जाने से रोकने के लिए वृक्ष कतार के पास खोदी जाने वाली खाई (Root trenching) की मानक गहराई कितनी रखी जाती है?
(A) 5 से 10 cm
(B) 60 से 100 cm (0.6 से 1.0 मीटर)
(C) 5 से 10 मीटर
(D) 20 मीटर
उत्तर एवं व्याख्या देखें (Show Answer & Explanation)
सही उत्तर (Answer): (B) 60 से 100 cm (0.6 से 1.0 मीटर)
वैज्ञानिक व्याख्या (Explanation): वृक्ष कतार से 1.0–1.5 m दूरी पर 30–50 cm चौड़ी और 60–100 cm गहरी खाई खोदकर सतही जड़ों को काट दिया जाता है।
6. भारत की कौन-सी पारंपरिक कृषि वानिकी प्रणाली ‘कृषि-जैव विविधता के हॉटस्पॉट’ के रूप में जानी जाती है जहाँ एक छोटे से भूखंड पर 30 से 120+ पादप प्रजातियाँ मिलती हैं?
(A) एकल पॉपलर रोपण
(B) केरल एवं पूर्वोत्तर की बहु-स्तरीय गृह वाटिकाएँ (Multi-tier Homegardens)
(C) केवल बंजर भूमि वनीकरण
(D) नहर किनारे रोपण
उत्तर एवं व्याख्या देखें (Show Answer & Explanation)
सही उत्तर (Answer): (B) केरल एवं पूर्वोत्तर की बहु-स्तरीय गृह वाटिकाएँ (Multi-tier Homegardens)
वैज्ञानिक व्याख्या (Explanation): आर्द्र उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की बहु-स्तरीय गृह वाटिकाएँ (Homestead agroforestry) उच्चतम प्रजाति विविधता और जर्मप्लाज्म संरक्षण करती हैं।
7. तमिलनाडु की प्रसिद्ध पारंपरिक ‘कांगायम सिल्वा-पाश्चर प्रणाली’ (Kangeyam system) में किस वृक्ष और घास का संयोजन होता है?
(A) खेजड़ी + सेवण घास
(B) रेऊंजा/श्वेत बबूल (Acacia leucophloea) + कोल्लूकाट्टई घास (Cenchrus glaucus)
(C) पॉपलर + बरसीम
(D) देवदार + राई घास
उत्तर एवं व्याख्या देखें (Show Answer & Explanation)
सही उत्तर (Answer): (B) रेऊंजा/श्वेत बबूल (Acacia leucophloea) + कोल्लूकाट्टई घास (Cenchrus glaucus)
वैज्ञानिक व्याख्या (Explanation): कांगायम प्रणाली में Acacia leucophloea वृक्षों के नीचे Cenchrus glaucus घास उगाकर कांगायम नस्ल के पशु पाले जाते हैं।
8. तौंग्या प्रणाली के तीनों रूपों (Departmental, Leased और Village Taungya) में से कौन-सा रूप सामाजिक और वानिकी दृष्टि से सबसे अधिक सफल रहा है?
(A) लीज्ड तौंग्या (Leased Taungya)
(B) विलेज तौंग्या (Village Taungya)
(C) डिपार्टमेंटल तौंग्या
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर एवं व्याख्या देखें (Show Answer & Explanation)
सही उत्तर (Answer): (B) विलेज तौंग्या (Village Taungya)
वैज्ञानिक व्याख्या (Explanation): विलेज तौंग्या सबसे सफल रहा है क्योंकि इसमें वन ग्रामों में बसे किसानों को भूमि आवंटित की जाती है और वे पौधों की देखभाल अपने खेत की तरह करते हैं।
9. राजस्थान में शीतकाल के दौरान चारे (‘लूंग’) की प्राप्ति और रबी फसलों को धूप देने के लिए खेजड़ी (Prosopis cineraria) में कौन-सी क्रिया की जाती है?
(A) जड़ से उखाड़ना
(B) लोपिंग / टहनी छँगाई (Lopping)
(C) गर्डलिंग (Girdling)
(D) क्लीयर फेलिंग
उत्तर एवं व्याख्या देखें (Show Answer & Explanation)
सही उत्तर (Answer): (B) लोपिंग / टहनी छँगाई (Lopping)
वैज्ञानिक व्याख्या (Explanation): खेजड़ी की पार्श्व शाखाओं व टहनियों को चारे और ईंधन के लिए काटने की पारंपरिक क्रिया ‘लोपिंग’ (Lopping) कहलाती है।
10. बर्मी भाषा के शब्द ‘Taungya’ में ‘Taung’ और ‘Ya’ का शाब्दिक अर्थ क्या है?
(A) जल और वन
(B) पहाड़ी (Hill) और खेती (Cultivation)
(C) मैदान और चारागाह
(D) वृक्ष और पशु
उत्तर एवं व्याख्या देखें (Show Answer & Explanation)
सही उत्तर (Answer): (B) पहाड़ी (Hill) और खेती (Cultivation)
वैज्ञानिक व्याख्या (Explanation): बर्मी भाषा में ‘Taung’ का अर्थ पहाड़ी (Hill) और ‘Ya’ का अर्थ खेती (Cultivation) अर्थात् पहाड़ी खेती होता है।

16 अति-लघु, लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न व वन-लाइनर्स (Exam Question Bank)

(A) 5 महत्वपूर्ण वन-लाइनर्स (5 Important Exam One-Liners)

  1. पोलार्डिंग में वृक्ष को लगभग 2.0 मीटर की ऊँचाई पर काटा जाता है, जबकि कॉपिसिंग में भूमि से 15–30 cm की ऊँचाई पर काटा जाता है।
  2. डॉ. डाइट्रिच ब्रैंडिस ने 1856 में म्यांमार में तौंग्या प्रणाली शुरू की और भारत में यह 1890 में उत्तरी बंगाल में प्रारंभ हुई।
  3. कृषि वानिकी में फसलों पर छाया कम करने के लिए वृक्षों की कतारें सदैव ‘पूर्व-पश्चिम दिशा’ (East-West) में लगाई जाती हैं।
  4. गाँठ-मुक्त सीधी इमारती लकड़ी प्राप्त करने के लिए तने की निचली शाखाओं को हटाना ‘प्रूनिंग’ (Pruning) कहलाता है।
  5. जड़ प्रतिस्पर्धा रोकने के लिए वृक्ष कतार से 1–1.5 m दूरी पर 60–100 cm गहरी खाई खोदना ‘रूट ट्रेंचिंग’ कहलाता है।

(B) 5 अति-लघु उत्तरीय प्रश्न (5 Very Short Answer Questions)

1. पोलार्डिंग (Pollarding) और कॉपिसिंग (Coppicing) में कट लगाने की ऊँचाई में क्या अंतर है?
उत्तर: कॉपिसिंग में कट जमीन के बिल्कुल पास (15–30 cm ऊँचाई पर) लगाया जाता है, जबकि पोलार्डिंग में कट लगभग 2.0 मीटर की ऊँचाई पर लगाया जाता है।
2. भारत में प्रथम तौंग्या वृक्षारोपण कब और कहाँ किया गया था?
उत्तर: वर्ष 1890 में उत्तरी बंगाल (North Bengal) में।
3. वृक्षों की जड़ प्रतिस्पर्धा को नियंत्रित करने के लिए कौन-सी यांत्रिक विधि अपनाई जाती है?
उत्तर: रूट ट्रेंचिंग (Root trenching — वृक्ष कतार से 1–1.5 m दूरी पर 60–100 cm गहरी खाई खोदना) तथा गहरी जुताई (Deep ploughing)।
4. लोपिंग (Lopping) करते समय वृक्ष के छत्र का कितना भाग सुरक्षित छोड़ना चाहिए?
उत्तर: वृक्ष के ऊपरी एक-तिहाई (Upper 1/3rd) छत्र को सुरक्षित छोड़ना चाहिए ताकि वृक्ष की वृद्धि बाधित न हो।
5. भारत की किन्हीं चार पारंपरिक कृषि वानिकी प्रणालियों के नाम लिखिए।
उत्तर: (1) केरल के होमगार्डन, (2) राजस्थान की खेजड़ी प्रणाली व ओरण, (3) पूर्वोत्तर की एल्डर-इलायची व ज़ाबो प्रणाली, और (4) तौंग्या प्रणाली।

(C) 5 लघु उत्तरीय प्रश्न (5 Short Answer Questions)

1. भारत की कृषि-जैव विविधता (Agro-biodiversity) के संरक्षण में पारंपरिक कृषि वानिकी किस प्रकार एक व्यावहारिक विकल्प है?
उत्तर: पारंपरिक कृषि वानिकी प्रणालियाँ (जैसे केरल के होमगार्डन, राजस्थान की खेजड़ी-ओरण प्रणाली और हिमालय की एल्डर प्रणाली) एक ही खेत पर दर्जनों देशी वृक्ष, अनाज, दलहन, कंद फसलों और औषधीय पौधों की पारंपरिक किस्मों (Landraces) का ‘ऑन-फार्म संरक्षण’ (Circa-situ conservation) करती हैं। ये प्राकृतिक वनों पर ईंधन/चारे का दबाव घटाती हैं, संरक्षित वनों के बीच वन्यजीव गलियारे (Connectivity) बनाती हैं और परागणकर्ताओं व मृदा जीवों को आश्रय देती हैं।
2. कॉपिसिंग (Coppicing), पोलार्डिंग (Pollarding), लोपिंग (Lopping) और प्रूनिंग (Pruning) में उदाहरण सहित अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: कॉपिसिंग में वृक्ष को जमीन से 15–30 cm ऊँचाई पर काटा जाता है (सफेदा, सुबबूल)। पोलार्डिंग में पशुओं की पहुँच से ऊपर ~2 m ऊँचाई पर तने का शीर्ष काटा जाता है (विलो, अंजन, शहतूत)। लोपिंग में चारे व ईंधन के लिए पार्श्व टहनियाँ काटी जाती हैं (खेजड़ी, भीमल)। प्रूनिंग में गाँठ-मुक्त सीधा तना पाने के लिए निचली शाखाओं को तने के पास से साफ किया जाता है (पॉपलर, सागवान)।
3. तौंग्या प्रणाली (Taungya System) क्या है? इसके तीनों प्रकारों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर: डॉ. डाइट्रिच ब्रैंडिस (1856) द्वारा विकसित तौंग्या प्रणाली में वन विभाग की भूमि पर वृक्षारोपण के शुरुआती 2–4 वर्षों में वृक्ष कतारों के बीच कृषि फसलें उगाई जाती हैं। इसके 3 प्रकार हैं: (1) Departmental Taungya (वन विभाग स्वयं मजदूरी देकर फसल उगवाता है), (2) Leased Taungya (ठेकेदारों को पट्टे पर भूमि दी जाती है), और (3) Village Taungya (वन ग्रामों के किसानों को भूमि दी जाती है — यह सबसे सफल प्रणाली है)।
4. कृषि वानिकी में भूमि के नीचे जड़ प्रतिस्पर्धा (Below-ground root competition) को कैसे प्रबंधित किया जाता है?
उत्तर: जड़ प्रतिस्पर्धा घटाने के लिए: (1) गहरी मूसला जड़ वाले वृक्षों (जैसे खेजड़ी) का चयन किया जाता है, (2) वृक्ष की कतार से 1.0–1.5 m की दूरी पर 30–50 cm चौड़ी और 60–100 cm गहरी खाई (Root trenching) खोदकर ऊपरी पार्श्व जड़ों को काट दिया जाता है, (3) फसल बुवाई से पूर्व गहरी जुताई (Deep ploughing) की जाती है, और (4) खाई में पॉलीथीन या टिन का रूट बैरियर लगाया जाता है।
5. कृषि वानिकी में फसलों को पर्याप्त प्रकाश (Light) उपलब्ध कराने के लिए कौन-से प्रबंधन उपाय अपनाए जाते हैं?
उत्तर: (1) वृक्षों की कतारें सदैव पूर्व-पश्चिम दिशा (East-West orientation) में लगाना, (2) कतार से कतार की दूरी पर्याप्त रखना (जैसे पॉपलर में 5×4 m या 8×2.5 m), (3) समय पर प्रूनिंग, लोपिंग और पोलार्डिंग कर छत्र को हल्का रखना, (4) वृक्ष बड़े होने पर थिनिंग (Thinning) करना, और (5) बाद के वर्षों में हल्दी/अदरक जैसी छाया-सहनशील फसलें उगाना।

(D) 3 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (3 Long Answer Questions)

1. भारत की कृषि-जैव विविधता (Agro-biodiversity) के संरक्षण में पारंपरिक कृषि वानिकी प्रणालियों (होमगार्डन, खेजड़ी प्रणाली, ओरण, तौंग्या, एल्डर एवं कांगायम प्रणाली) की भूमिका और महत्व का सविस्तार वर्णन कीजिए।
उत्तर रूपरेखा एवं मुख्य बिंदु: पारंपरिक प्रणालियों का क्षेत्रवार विवरण देते हुए बताएँ कि कैसे केरल के होमगार्डन (30-120 प्रजातियाँ), राजस्थान की खेजड़ी-ओरण प्रणाली, सिक्किम की एल्डर-इलायची प्रणाली और तौंग्या प्रणाली देशी जर्मप्लाज्म संरक्षण, वनोन्मूलन में कमी, लैंडस्केप कनेक्टिविटी और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखती हैं।
2. कृषि वानिकी प्रणाली के प्रबंधन (Management of Agroforestry System) से आप क्या समझते हैं? प्रकाश, जल और पोषक तत्वों के इष्टतम उपयोग के लिए छत्र प्रबंधन (Canopy management) और जड़ प्रबंधन (Root management) की सभी तकनीकों की विस्तृत व्याख्या कीजिए।
उत्तर रूपरेखा एवं मुख्य बिंदु: छत्र प्रबंधन की 6 तकनीकों (Pruning, Lopping, Pollarding at 2m, Coppicing at 15-30cm, Thinning, East-West orientation) की तुलनात्मक सारणी तथा जड़ प्रबंधन (Root trenching 60-100 cm, Deep ploughing, Root barriers) का सचित्र व वैज्ञानिक वर्णन करें।
3. तौंग्या (Taungya) और शिफ्टिंग कल्टीवेशन (झूम खेती) की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, कार्यप्रणाली, प्रकार, लाभ और सीमाओं की तुलनात्मक विवेचना कीजिए।
उत्तर रूपरेखा एवं मुख्य बिंदु: ब्रैंडिस (1856/1890) की तौंग्या प्रणाली (Departmental, Leased, Village Taungya) के लाभ-दोष तथा पूर्वोत्तर भारत की झूम खेती में सुधार हेतु एलै क्रॉपिंग और एल्डर आधारित प्रणालियों के योगदान का वर्णन करें।

आधार: उपयोगकर्ता द्वारा उपलब्ध AGF 311 notes।

Similar Posts