AGF 311 Lecture 04: भारत की कृषि-जैव विविधता संरक्षण हेतु पारंपरिक कृषि वानिकी; कृषि वानिकी प्रणाली का प्रबंधन | Hindi Notes
AGRO PATH FINDERAGF 311 · Introductory Agroforestry
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02 अधिगम उद्देश्य (Learning Objectives)03 प्रस्तावना एवं मूल अवधारणा (Introduction)04 महत्वपूर्ण वैज्ञानिक परिभाषाएँ (Important Definitions)05 विस्तृत विषय व्याख्या (Detailed Topic Explanation)06 प्रकार एवं वैज्ञानिक वर्गीकरण (Types and Classification)07 महत्वपूर्ण सिद्धांत एवं समीकरण (Important Principles and Concepts)08 वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक उदाहरण व गणनाएँ (Scientific & Practical Examples)09 तुलनात्मक सारणियाँ (Comparative Tables)10 महत्वपूर्ण सूत्र एवं तकनीकी मानक (Formulas & Key Metrics)11 व्याख्यान-विशिष्ट माइंड मैप (Lecture-Specific Mind Map)12 प्रक्रिया प्रवाह चित्र एवं आरेख (Flowcharts & Visual Diagrams)13 महत्वपूर्ण तथ्य एवं परीक्षा टिप्स (Important Facts & Exam Tips)14 त्वरित पुनरावृत्ति सारांश (Quick Revision Panel)15 बहुविकल्पीय प्रश्न — उत्तर एवं व्याख्या सहित (10 MCQs with Answers)16 अति-लघु, लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न व वन-लाइनर्स (Exam Question Bank)Lecture 04: भारत की कृषि-जैव विविधता संरक्षण हेतु पारंपरिक कृषि वानिकी; कृषि वानिकी प्रणाली का प्रबंधन
Traditional agroforestry as a viable choice to conserve agro biodiversity of India; Management of agro-forestry system
02 अधिगम उद्देश्य (Learning Objectives)
इस व्याख्यान (Lecture) के अध्ययन के पश्चात् विद्यार्थी निम्नलिखित में सक्षम होंगे:
- भारत की प्रमुख पारंपरिक कृषि वानिकी प्रणालियों—केरल व असम के बहु-स्तरीय होमगार्डन, राजस्थान की खेजड़ी व ओरण प्रणाली, तौंग्या (Taungya) प्रणाली, पूर्वोत्तर की झूम व एल्डर प्रणाली तथा तमिलनाडु की कांगायम प्रणाली—का अध्ययन करना।
- भारत की कृषि-जैव विविधता (Agro-biodiversity) के ‘सर्का-सीटू’ (Circa-situ / On-farm) संरक्षण और पारिस्थितिक गलियारे (Landscape connectivity) के रूप में पारंपरिक कृषि वानिकी की भूमिका को समझना।
- कृषि वानिकी प्रणाली में भूमि के ऊपर छत्र/प्रकाश प्रबंधन (Canopy Management) की 5 प्रमुख तकनीकों—प्रूनिंग (Pruning), पोलार्डिंग (Pollarding), लोपिंग (Lopping), कॉपिसिंग (Coppicing) और थिनिंग (Thinning)—में अंतर और अनुप्रयोग समझना।
- भूमि के नीचे जड़ प्रतिस्पर्धा नियंत्रण (Below-ground Root Management) की तकनीकों—रूट ट्रेंचिंग (Root trenching: 30–50 cm चौड़ी व 60–100 cm गहरी खाई), गहरी जुताई और कॉलर रिंगिंग—को समझना।
03 प्रस्तावना एवं मूल अवधारणा (Introduction)
मूल सामग्री (Core Course Content): भारत में कृषि वानिकी हजारों वर्षों से किसानों की जीवनशैली का अभिन्न अंग रही है। आधुनिक एकल-फसल (Monoculture) खेती के कारण जहाँ देशी फसलों की किस्में, चारा वृक्ष और लाभदायक कीट-पक्षी तेजी से विलुप्त हो रहे हैं, वहीं पारंपरिक कृषि वानिकी प्रणालियाँ (Traditional Agroforestry Systems) भारत की समृद्ध कृषि-जैव विविधता (Agro-biodiversity) के संरक्षण के लिए सबसे व्यावहारिक एवं टिकाऊ विकल्प (Viable choice) सिद्ध हुई हैं।
इसके साथ ही, खेत में वृक्ष और फसल से अधिकतम संयुक्त उपज () लेने के लिए वृक्ष के छत्र (Canopy) और जड़ तंत्र (Root system) का समयबद्ध वैज्ञानिक प्रबंधन (Management of Agroforestry System) करना अत्यंत आवश्यक है ताकि फसलों को प्रकाश, जल और पोषक तत्वों की कमी न हो।
04 महत्वपूर्ण वैज्ञानिक परिभाषाएँ (Important Definitions)
05 विस्तृत विषय व्याख्या (Detailed Topic Explanation)
1. भारत की प्रमुख पारंपरिक कृषि वानिकी प्रणालियाँ एवं जैव-विविधता संरक्षण
1. उष्णकटिबंधीय गृह वाटिकाएँ (Tropical Homegardens — केरल, असम, अंडमान)
• इन्हें ‘जैव-विविधता के हॉटस्पॉट’ कहा जाता है। केरल की मात्र 0.2–0.5 हेक्टेयर की गृह वाटिका में 3 से 4 ऊर्ध्वाधर स्तरों (Multi-tiers) में 30 से 120 से अधिक पादप प्रजातियाँ (नारियल, सुपारी, कटहल, आम, केला, काली मिर्च, इलायची, हल्दी, अदरक, सब्जियाँ व औषधीय पौधे) संरक्षित रहती हैं।
• ये देशी लैंडरेस (Landraces) और जंगली फसल संबंधियों के ‘इन-सीटू / ऑन-फार्म संरक्षण’ (In-situ / Circa-situ conservation) का सर्वोत्तम माध्यम हैं।
2. राजस्थान की खेजड़ी एवं ओरण/गोचर प्रणाली (Arid Khejri & Oran System)
• थार मरुस्थल में किसान अपने खेतों में खेजड़ी (Prosopis cineraria), रोहिड़ा, बोरड़ी (Ziziphus nummularia) और केर (Capparis decidua) को प्राकृतिक रूप से संरक्षित रखते हैं और उनके नीचे बाजरा, मोठ, ग्वार व तिल उगाते हैं।
• सामुदायिक पवित्र उपवन ‘ओरण’ (Oran) और ‘गोचर’ मरुस्थलीय वनस्पतियों, सेवण घास और चिंकारा/गोडावण जैसे वन्यजीवों की जैव-विविधता के जीवंत बैंक हैं।
3. तौंग्या प्रणाली (Taungya System — Departmental, Leased & Village)
• 1890 में भारत (उत्तरी बंगाल) में और 1923 में गोरखपुर (उ.प्र. में साल व सागवान हेतु) में प्रचलित।
• इसके 3 प्रकार हैं: (i) Departmental Taungya (वन विभाग स्वयं वेतनभोगी श्रमिकों से फसल उगवाता है), (ii) Leased Taungya (सर्वाधिक बोली लगाने वाले को पट्टे पर भूमि), और (iii) Village Taungya (सबसे सफल — वन ग्राम के स्थायी किसानों को 1–2 ha भूमि दी जाती है)।
4. कांगायम एवं एल्डर प्रणालियाँ (Kangeyam & Alder Systems)
• कांगायम सिल्वा-पाश्चर प्रणाली (तमिलनाडु): Acacia leucophloea (रेऊंजा/श्वेत बबूल) + Cenchrus glaucus (कोल्लूकाट्टई घास) + कांगायम नस्ल के मवेशी।
• नागालैंड की ज़ाबो (Zabo) एवं एल्डर (Alnus nepalensis) प्रणाली: झूम खेती के परती चक्र को छोटा करने और मृदा उर्वरता व जैव-विविधता बचाने में सहायक।
जैव-विविधता संरक्षण के 4 पारिस्थितिक तंत्र (Mechanisms of Biodiversity Conservation): (1) वनों की कटाई (Deforestation) और दबाव में कमी, (2) खंडित वनों के बीच वन्यजीवों के आवागमन हेतु पारिस्थितिक गलियारे (Ecological corridors & landscape connectivity) प्रदान करना, (3) मृदा सूक्ष्मजीवों, पक्षियों व मधुमक्खियों को आवास देना, और (4) देशी वृक्ष व फसल जर्मप्लाज्म का संरक्षण।
2. कृषि वानिकी प्रणाली का वैज्ञानिक प्रबंधन (Management of Agroforestry System)
वृक्ष और फसल के बीच संसाधन (प्रकाश, जल, पोषक तत्व) प्रतिस्पर्धा को कम करने और भूमि समतुल्य अनुपात (LER) को अधिकतम करने के लिए प्रबंधन को दो भागों में बाँटा जाता है:
(A) भूमि के ऊपर छत्र / प्रकाश प्रबंधन (Above-ground Canopy Management)
- प्रूनिंग / कृंतन (Pruning): मुख्य तने के निचले 1/3 से 1/2 भाग की पार्श्व शाखाओं को तने के बिल्कुल पास (Flush with stem) से काटना। इससे गाँठ-मुक्त इमारती लकड़ी (Knot-free timber) मिलती है और फसलों पर तिरछी धूप आसानी से पहुँचती है (जैसे—पॉपलर और सागवान में)।
- लोपिंग / छँगाई (Lopping): चारे और ईंधन के लिए वृक्ष की ऊपरी और पार्श्व टहनियों को काटना। राजस्थान में खेजड़ी और हिमालय में भीमल की लोपिंग शीतकाल (नवंबर-दिसंबर) में की जाती है जिससे रबी फसलों को पूरी धूप मिलती है। (नियम: छत्र के ऊपरी 1/3 भाग को सुरक्षित छोड़ना चाहिए और 2–3 वर्ष से कम आयु के पौधों की लोपिंग नहीं करनी चाहिए)।
- पोलार्डिंग (Pollarding): वृक्ष के मुख्य तने को जमीन से 2.0 मीटर की ऊँचाई पर काट देना ताकि पशुओं की चराई पहुँच (Browsing reach) से ऊपर नए प्ररोहों का घना छत्र विकसित हो। यह Hardwickia binata (अंजन वृक्ष), Salix (विलो), Morus alba (शहतूत) और Gliricidia में अत्यंत लोकप्रिय है।
- कॉपिसिंग (Coppicing): वृक्ष को जमीन के पास (15 से 30 cm ऊँचाई पर तिरछा कट ताकि वर्षा का पानी ठूंठ पर न रुके) काट देना। एलै क्रॉपिंग में Leucaena leucocephala की हेजरो को 30–50 cm पर बार-बार कॉपिस/प्रून किया जाता है।
- थिनिंग (Thinning — विरलन): जब वृक्ष बड़े होकर आपस में और फसलों पर अत्यधिक छाया करने लगते हैं, तो कुल वृक्षों में से कमजोर या अतिरिक्त वृक्षों (जैसे 25% से 50% वृक्ष) को हटाकर अंतराल बढ़ाया जाता है।
- वृक्ष कतार की दिशा (Row Orientation): कृषि वानिकी में वृक्षों की कतारें सदैव पूर्व से पश्चिम (East-West direction) में लगानी चाहिए ताकि सूर्य के पूर्व से पश्चिम गमन के दौरान बीच की फसल पट्टी पर न्यूनतम छाया पड़े।
(B) भूमि के नीचे जड़ प्रबंधन (Below-ground Root Management)
- रूट ट्रेंचिंग (Root Trenching / खाई खोदना): वृक्षों की कतार के दोनों ओर तने से 1.0 से 1.5 मीटर की दूरी पर 30–50 cm चौड़ी और 60–100 cm गहरी खाई (Trench) खोदकर सतही पार्श्व जड़ों (Lateral feeder roots) को काट दिया जाता है। इससे वृक्ष अपनी गहरी जड़ों से पानी लेने के लिए बाध्य होता है और फसल क्षेत्र में नमी स्पर्धा समाप्त हो जाती है।
- गहरी जुताई (Deep Ploughing / Sub-soiling): मानसून से पहले खेत की गहरी जुताई (20–30 cm) करने से वृक्षों की ऊपरी परत में आने वाली बारीक जड़ें स्वतः कट जाती हैं।
- रूट बैरियर (Root Barriers): खाई में पॉलीथीन शीट या जीआई शीट लगाकर जड़ों का फैलाव रोकना।
06 प्रकार एवं वैज्ञानिक वर्गीकरण (Types and Classification)
कृषि वानिकी प्रबंधन तकनीकों का वर्गीकरण:
- 1. छत्र प्रबंधन (Canopy / Light Management): Pruning (शाखा कृंतन), Lopping (टहनी छँगाई), Pollarding (2 m पर शीर्ष कर्तन), Coppicing (15-30 cm पर आधार कर्तन), Thinning (विरलन) एवं Bending।
- 2. जड़ प्रबंधन (Root / Water-Nutrient Management): Deep ploughing (गहरी जुताई), Root trenching (60-100 cm गहरी खाई), Root barriers एवं स्थानीयकृत उर्वरक/ड्रिप सिंचाई।
07 महत्वपूर्ण सिद्धांत एवं समीकरण (Important Principles and Concepts)
- पोलार्डिंग बनाम कॉपिसिंग का शरीर-क्रियात्मक सिद्धांत: कॉपिसिंग में कट जमीन के पास (15–30 cm) लगाया जाता है इसलिए नए कोमल प्ररोहों को मवेशी आसानी से चर सकते हैं; जबकि पोलार्डिंग में कट 2 मीटर की ऊँचाई पर लगाया जाता है जिससे नए प्ररोह पशुओं की पहुँच (Browsing height) से सुरक्षित रहते हैं और नीचे फसल को धूप भी मिल जाती है।
08 वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक उदाहरण व गणनाएँ (Scientific & Practical Examples)
व्यावहारिक उदाहरण: खेजड़ी की शीतकालीन लोपिंग और पॉपलर में प्रूनिंग
- खेजड़ी में लोपिंग (राजस्थान): पश्चिमी राजस्थान में किसान नवंबर-दिसंबर में खेजड़ी के वृक्षों की लोपिंग (छँगाई) करके पत्तियों का चारा (‘लूंग’) एकत्र कर लेते हैं। इससे सर्दियों में रबी की फसल (गेहूँ/सरसों/चना) को पूरी धूप मिलती है और मई-जून की भीषण गर्मी आते-आते खेजड़ी में पुनः हरा छत्र आ जाता है।
- पॉपलर में प्रूनिंग (उत्तर भारत): पॉपलर के वृक्षों में प्रथम वर्ष के बाद निचले 1/3 से 1/2 तने की शाखाओं की प्रूनिंग बोरडो पेस्ट लगाकर की जाती है ताकि प्लाईवुड उद्योग के लिए बिना गाँठ वाला सीधा तना मिले।
09 तुलनात्मक सारणियाँ (Comparative Tables)
तुलनात्मक सारणी 4.1: कॉपिसिंग (Coppicing), पोलार्डिंग (Pollarding), लोपिंग (Lopping) एवं प्रूनिंग (Pruning) की तुलना
| प्रबंधन क्रिया (Operation) | काटे जाने वाले भाग एवं ऊँचाई | मुख्य उद्देश्य (Primary Objective) | प्रमुख उपयुक्त वृक्ष प्रजातियाँ |
|---|---|---|---|
| 1. कॉपिसिंग (Coppicing) | मुख्य तने को भूमि के पास (15–30 cm ऊँचाई) पर काटना। | ठूंठ से नए तने उगाकर ईंधन, लुगदी, खंभे व हरी खाद प्राप्त करना। | Eucalyptus, Tectona grandis, Dalbergia sissoo, Leucaena |
| 2. पोलार्डिंग (Pollarding) | मुख्य तने के शीर्ष को ~2.0 मीटर ऊँचाई पर काटना। | पशु चराई से ऊपर नए प्ररोह (चारा/टहनियाँ) प्राप्त करना व छाया घटाना। | Hardwickia binata, Salix alba, Morus alba, Gliricidia |
| 3. लोपिंग (Lopping) | पार्श्व शाखाओं व हरी टहनियों को चयनात्मक रूप से काटना। | पशुओं के लिए हरा पत्ती चारा (Top feed) व जलाऊ लकड़ी लेना तथा धूप बढ़ाना। | Prosopis cineraria (खेजड़ी), Ailanthus excelsa, Grewia optiva |
| 4. प्रूनिंग (Pruning) | तने के निचले भाग की पार्श्व शाखाओं को तने के बिल्कुल पास से काटना। | गाँठ-मुक्त सीधा इमारती तना (Knot-free clean bole) प्राप्त करना। | Populus deltoides (पॉपलर), Tectona grandis, Melia dubia |
10 महत्वपूर्ण सूत्र एवं तकनीकी मानक (Formulas & Key Metrics)
महत्वपूर्ण प्रबंधन मानक एवं ऐतिहासिक वर्ष (Key Management Standards)
- तौंग्या प्रणाली (Taungya System): प्रतिपादक = डॉ. डाइट्रिच ब्रैंडिस (Dr. Dietrich Brandis, 1856 म्यांमार) | भारत में प्रथम तौंग्या = 1890 (उत्तरी बंगाल)
- कॉपिसिंग कट की मानक ऊँचाई: भूमि स्तर से ऊपर (तिरछा कट)
- पोलार्डिंग कट की मानक ऊँचाई: भूमि स्तर से ऊपर (पशुओं की पहुँच से ऊपर)
- रूट ट्रेंचिंग (Root Trench) आकार: चौड़ाई = , गहराई = (वृक्ष कतार से दूरी पर)
- आदर्श वृक्ष कतार अभिविन्यास (Row Orientation): पूर्व-पश्चिम दिशा (East–West Direction) (फसलों को अधिकतम धूप हेतु)
11 व्याख्यान-विशिष्ट माइंड मैप (Lecture-Specific Mind Map)
Lecture 04 Mind Map: पारंपरिक कृषि वानिकी (जैव-विविधता संरक्षण) एवं छत्र/जड़ प्रबंधन
- पारंपरिक कृषि वानिकी एवं प्रणाली प्रबंधन (Agro-biodiversity Conservation & Canopy/Root Management)
- भारत की पारंपरिक प्रणालियाँ व जैव-विविधता (Traditional Systems)
- होमगार्डन (केरल/असम): 3-4 स्तर, 30–120+ प्रजातियाँ, इन-सीटू/ऑन-फार्म जर्मप्लाज्म संरक्षण
- शुष्क खेजड़ी व ओरण (राजस्थान): खेजड़ी + बाजरा तथा पवित्र ओरण/गोचर चारागाह संरक्षण
- तौंग्या (Taungya – Brandis 1856 / भारत 1890): Departmental, Leased एवं Village Taungya
- अन्य: तमिलनाडु की कांगायम प्रणाली (Acacia leucophloea + Cenchrus) एवं पूर्वोत्तर की एल्डर/ज़ाबो प्रणाली
- भूमि के ऊपर छत्र प्रबंधन (Above-Ground Canopy Management)
- कॉपिसिंग (Coppicing): 15–30 cm ऊँचाई पर आधार कर्तन (सफेदा, सागवान, सुबबूल)
- पोलार्डिंग (Pollarding): 2.0 m ऊँचाई पर शीर्ष कर्तन (विलो, अंजन, शहतूत)
- लोपिंग (Lopping) व प्रूनिंग (Pruning): चारे हेतु टहनी छँगाई (खेजड़ी) एवं गाँठ-मुक्त तने हेतु प्रूनिंग (पॉपलर)
- कतार दिशा व थिनिंग: पूर्व-पश्चिम (East-West) पंक्ति अभिविन्यास एवं विरलन
- भूमि के नीचे जड़ प्रबंधन (Below-Ground Root Management)
- रूट ट्रेंचिंग (Trenching): 30–50 cm चौड़ी व 60–100 cm गहरी खाई खोदकर पार्श्व जड़ें काटना + गहरी जुताई
- भारत की पारंपरिक प्रणालियाँ व जैव-विविधता (Traditional Systems)
12 प्रक्रिया प्रवाह चित्र एवं आरेख (Flowcharts & Visual Diagrams)
प्रक्रिया प्रवाह चित्र (Process Flowchart): कृषि वानिकी में वृक्ष-फसल प्रतिस्पर्धा कम करने हेतु एकीकृत प्रबंधन चक्र
(पूर्व-पश्चिम कतार व उचित अंतराल) ➔ 2. प्रूनिंग (1/3 से 1/2 तना)
(गाँठ-मुक्त सीधा तना व तिरछी धूप) ➔ 3. मौसमी लोपिंग / पोलार्डिंग
(फसल बुवाई पूर्व छत्र हल्का करना + चारा) ➔ 4. रूट ट्रेंचिंग / गहरी जुताई
(60–100 cm खाई से सतही जड़ें काटना) ➔ 5. अधिकतम संयुक्त उपज
(उच्च LER > 1.0 एवं टिकाऊ उत्पादन)
13 महत्वपूर्ण तथ्य एवं परीक्षा टिप्स (Important Facts & Exam Tips)
- पोलार्डिंग (Pollarding) और कॉपिसिंग (Coppicing) में ऊँचाई का अंतर परीक्षा में अवश्य पूछा जाता है: कॉपिसिंग में तने को जमीन के पास (15–30 cm) काटा जाता है, जबकि पोलार्डिंग में पशुओं की पहुँच से ऊपर लगभग 2 मीटर की ऊँचाई पर काटा जाता है।
- तौंग्या (Taungya) प्रणाली का प्रतिपादन 1856 में म्यांमार (बर्मा) में डॉ. डाइट्रिच ब्रैंडिस (Dr. Dietrich Brandis – भारत के प्रथम महानिरीक्षक वन) ने किया था और भारत में यह सर्वप्रथम 1890 में उत्तरी बंगाल में शुरू हुई।
- तौंग्या के तीनों प्रकारों (Departmental, Leased, Village) में ‘विलेज तौंग्या’ (Village Taungya) सबसे अधिक सफल और लोकप्रिय रहा है।
- फसलों पर वृक्षों की छाया को न्यूनतम करने के लिए वृक्षों की कतारें हमेशा ‘पूर्व-पश्चिम दिशा’ (East-West direction) में लगानी चाहिए।
- तमिलनाडु की प्रसिद्ध पारंपरिक ‘कांगायम सिल्वा-पाश्चर प्रणाली’ में Acacia leucophloea वृक्ष के साथ Cenchrus glaucus घास उगाई जाती है।
14 त्वरित पुनरावृत्ति सारांश (Quick Revision Panel)
- तौंग्या (Taungya): बर्मी शब्द (Taung = पहाड़ी, Ya = खेती) | ब्रैंडिस (1856) | भारत में 1890 (उत्तरी बंगाल)।
- छत्र प्रबंधन: Coppicing (15–30 cm), Pollarding (~2.0 m), Lopping (चारे हेतु शाखा छँगाई), Pruning (गाँठ-मुक्त इमारती तना)।
- जड़ प्रबंधन: Root Trenching (30–50 cm चौड़ी, 60–100 cm गहरी खाई) एवं Deep Ploughing।
- कतार अभिविन्यास: पूर्व-पश्चिम (East–West) दिशा।
15 बहुविकल्पीय प्रश्न — उत्तर एवं व्याख्या सहित (10 MCQs with Answers)
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16 अति-लघु, लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न व वन-लाइनर्स (Exam Question Bank)
(A) 5 महत्वपूर्ण वन-लाइनर्स (5 Important Exam One-Liners)
- पोलार्डिंग में वृक्ष को लगभग 2.0 मीटर की ऊँचाई पर काटा जाता है, जबकि कॉपिसिंग में भूमि से 15–30 cm की ऊँचाई पर काटा जाता है।
- डॉ. डाइट्रिच ब्रैंडिस ने 1856 में म्यांमार में तौंग्या प्रणाली शुरू की और भारत में यह 1890 में उत्तरी बंगाल में प्रारंभ हुई।
- कृषि वानिकी में फसलों पर छाया कम करने के लिए वृक्षों की कतारें सदैव ‘पूर्व-पश्चिम दिशा’ (East-West) में लगाई जाती हैं।
- गाँठ-मुक्त सीधी इमारती लकड़ी प्राप्त करने के लिए तने की निचली शाखाओं को हटाना ‘प्रूनिंग’ (Pruning) कहलाता है।
- जड़ प्रतिस्पर्धा रोकने के लिए वृक्ष कतार से 1–1.5 m दूरी पर 60–100 cm गहरी खाई खोदना ‘रूट ट्रेंचिंग’ कहलाता है।
(B) 5 अति-लघु उत्तरीय प्रश्न (5 Very Short Answer Questions)
(C) 5 लघु उत्तरीय प्रश्न (5 Short Answer Questions)
(D) 3 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (3 Long Answer Questions)
आधार: उपयोगकर्ता द्वारा उपलब्ध AGF 311 notes।





