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AGF 311 Lecture 08: वन संवर्धन (Silviculture): परिभाषा, कार्यक्षेत्र एवं प्रमुख वृक्ष प्रजातियाँ; राजस्थान में चारागाह प्रणाली | Hindi Notes

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AGF 311 · Introductory Agroforestry
विषय सूची · Quick Navigation02 अधिगम उद्देश्य (Learning Objectives)03 प्रस्तावना एवं मूल अवधारणा (Introduction)04 महत्वपूर्ण वैज्ञानिक परिभाषाएँ (Important Definitions)05 विस्तृत विषय व्याख्या (Detailed Topic Explanation)06 प्रकार एवं वैज्ञानिक वर्गीकरण (Types and Classification)07 महत्वपूर्ण सिद्धांत एवं समीकरण (Important Principles and Concepts)08 वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक उदाहरण व गणनाएँ (Scientific & Practical Examples)09 तुलनात्मक सारणियाँ (Comparative Tables)10 महत्वपूर्ण सूत्र एवं तकनीकी मानक (Formulas & Key Metrics)11 व्याख्यान-विशिष्ट माइंड मैप (Lecture-Specific Mind Map)12 प्रक्रिया प्रवाह चित्र एवं आरेख (Flowcharts & Visual Diagrams)13 महत्वपूर्ण तथ्य एवं परीक्षा टिप्स (Important Facts & Exam Tips)14 त्वरित पुनरावृत्ति सारांश (Quick Revision Panel)15 बहुविकल्पीय प्रश्न — उत्तर एवं व्याख्या सहित (10 MCQs with Answers)16 अति-लघु, लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न व वन-लाइनर्स (Exam Question Bank)
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Lecture 08: वन संवर्धन (Silviculture): परिभाषा, कार्यक्षेत्र एवं प्रमुख वृक्ष प्रजातियाँ; राजस्थान में चारागाह प्रणाली

Silviculture: Definition, scope and important tree species; Pasture system in Rajasthan

02 अधिगम उद्देश्य (Learning Objectives)

इस व्याख्यान (Lecture) के अध्ययन के पश्चात् विद्यार्थी निम्नलिखित में सक्षम होंगे:

  1. वन संवर्धन (Silviculture) की लैटिन व्युत्पत्ति, मानक वैज्ञानिक परिभाषाओं (Toumey & Korstian, Champion & Seth, FRI), उद्देश्यों और कार्यक्षेत्र (Scope) को समझना।
  2. सिल्विक्स (Silvics – सैद्धांतिक आधार) और सिल्वीकल्चर (Silviculture – व्यावहारिक अनुप्रयोग) के बीच के अंतर को स्पष्ट करना।
  3. भारत और राजस्थान की प्रमुख वानिकी वृक्ष प्रजातियों (खेजड़ी, रोहिड़ा, नीम, बबूल, शीशम, सागवान, सफेदा, पॉपलर, सुबबूल, अर्डू) की वन-संवर्धन विशेषताओं का अध्ययन करना।
  4. राजस्थान में चारागाह प्रणाली (Pasture System in Rajasthan)—प्रमुख मरुस्थलीय घासों (सेवण, धामण, अंजन, करड़, ग्रामणा, मुरट), झाड़ी चारे (पाला/बोरड़ी) तथा सामुदायिक चारागाहों (‘ओरण’, ‘गोचर’, ‘बीड़’, ‘जोड़’)—को गहराई से समझना।
  5. वैज्ञानिक चराई प्रबंधन प्रणालियों (नियंत्रित, घूर्णी/Rotational, आस्थगित/Deferred एवं कट-एंड-कैरी चराई) का विश्लेषण करना।

03 प्रस्तावना एवं मूल अवधारणा (Introduction)

मूल सामग्री (Core Course Content): जिस प्रकार फसलों को उगाने के विज्ञान और कला को सस्य विज्ञान (Agronomy) कहा जाता है, उसी प्रकार वन वृक्षों और वन फसलों को उगाने, स्थापित करने और उनकी देखभाल करने के विज्ञान और कला को वन संवर्धन (Silviculture) कहा जाता है। Silviculture शब्द लैटिन भाषा के दो शब्दों—‘Silvi’ (अर्थात् वन या लकड़ी / Forest or Woods) और ‘Culture’ (अर्थात् उगाना या संवर्धन करना / Cultivation or Growing)—से मिलकर बना है।

इसके साथ ही, राजस्थान भारत का सबसे बड़ा पशुधन संपदा वाला शुष्क राज्य है जहाँ देश के स्थायी चारागाहों का लगभग 5.39% हिस्सा स्थित है। यहाँ की चारागाह प्रणाली (Pasture System in Rajasthan)—जिसमें बहुमूल्य मरुस्थलीय घासें (सेवण, धामण, अंजन, करड़), खेजड़ी-बोरड़ी सिल्वा-पाश्चर और प्राचीन सामुदायिक ओरण व गोचर शामिल हैं—शुष्क कृषि अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है।

04 महत्वपूर्ण वैज्ञानिक परिभाषाएँ (Important Definitions)

वन संवर्धन (Silviculture — Toumey & Korstian)
“वन संवर्धन वानिकी की वह शाखा है जो वन फसलों (Forest crops) की स्थापना, विकास, देखभाल (Care) और पुनरुत्पादन (Reproduction) से संबंधित है।”
वन संवर्धन (Silviculture — FRI / Champion & Seth)
“वन फसलों को उगाने और उनका संवर्धन करने की कला और विज्ञान (Art and science of cultivating forest crops) को सिल्वीकल्चर कहते हैं।”
सिल्विक्स (Silvics)
वन वृक्षों और वन समुदायों के जीवन इतिहास (Life history) और सामान्य विशेषताओं का पर्यावरण या स्थल कारकों (Site factors) के संदर्भ में वैज्ञानिक अध्ययन। सिल्विक्स सैद्धांतिक ज्ञान है, जबकि सिल्वीकल्चर उसका व्यावहारिक प्रयोग है।
ओरण एवं गोचर (Oran & Gochar in Rajasthan)
राजस्थान के गाँवों में स्थानीय लोक देवता/देवी के नाम पर समर्पित पवित्र वन एवं प्राकृतिक चारागाह भूमि को ‘ओरण’ (Sacred groves, जहाँ हरी लकड़ी काटना वर्जित है) तथा गाँव के पशुओं की चराई हेतु आरक्षित पंचायत भूमि को ‘गोचर’ (और शेखावाटी/पूर्व में ‘बीड़’ या ‘जोड़’) कहते हैं।
पाला / झड़बेरी (Pala — Ziziphus nummularia)
राजस्थान के शुष्क चारागाहों में पाई जाने वाली प्रमुख काँटेदार झाड़ी (बोरड़ी), जिसकी सूखी पत्तियों को ‘पाला’ (Pala) कहा जाता है जिसमें ~14% क्रूड प्रोटीन होता है और यह भेड़-बकरियों का सर्वोत्तम चारा है।

05 विस्तृत विषय व्याख्या (Detailed Topic Explanation)

1. वन संवर्धन के मुख्य उद्देश्य एवं कार्यक्षेत्र (Objectives & Scope of Silviculture)

  1. आर्थिक मूल्य की प्रजातियों का उत्पादन (Control of Species Composition): प्राकृतिक वन में अवांछित झाड़ियों के स्थान पर उच्च आर्थिक महत्व की प्रजातियों (सागवान, शीशम, रोहिड़ा, खेजड़ी) को बढ़ावा देना।
  2. उच्च घनत्व एवं प्रति इकाई अधिकतम आयतन उत्पादन (Control of Stand Density): खेत या वन में इष्टतम पौध संख्या रखकर प्रति हेक्टेयर अधिकतम बायोमास और लकड़ी प्राप्त करना।
  3. उच्च गुणवत्ता वाली इमारती लकड़ी का उत्पादन: प्रूनिंग और थिनिंग (Tending operations) द्वारा गाँठ-मुक्त, सीधी और बेलनाकार लकड़ी तैयार करना।
  4. आवर्तन काल को छोटा करना (Shortening Rotation Period): उन्नत सिल्वीकल्चर तकनीकों से 60 वर्ष में तैयार होने वाले वृक्ष को कम समय में तैयार करना।
  5. बंजर एवं निम्नीकृत भूमियों का वनीकरण (Afforestation of Blank/Degraded Areas): बालू के टीलों, बीहड़ों और लवणीय भूमियों को हरित बनाना।
  6. प्राकृतिक पुनर्जनन सुनिश्चित करना एवं वनों की रक्षा करना।

2. प्रमुख वृक्ष प्रजातियों का संक्षिप्त सिल्वीकल्चरल परिचय (Important Tree Species)

  • 1. सागवान (Teak — Tectona grandis, कुल: Lamiaceae/Verbenaceae): भारत की सर्वोत्तम इमारती लकड़ी (‘King of Timber’); उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वृक्ष; प्रकाश-प्रिय (Strong light demander); स्टंप (Stump / Root-shoot cutting) द्वारा सर्वोत्तम प्रवर्धन।
  • 2. शीशम (Sissoo — Dalbergia sissoo, कुल: Fabaceae): उत्तर भारत की प्रमुख फर्नीचर काष्ठ; जलोढ़ मृदा व नहर किनारे उपयुक्त; बीज, स्टंप एवं मूल प्ररोह (Root suckers) से प्रवर्धन; पाला व सूखा सहनशील।
  • 3. खेजड़ी (Khejri — Prosopis cineraria, कुल: Fabaceae): शुष्क क्षेत्र (100–500 mm वर्षा) का कल्पवृक्ष; 20–30 मीटर गहरी मूसला जड़; पाला व सूखा प्रतिरोधी; बीज व रूट सकर्स से प्रवर्धन।
  • 4. रोहिड़ा (Marwar Teak — Tecomella undulata, कुल: Bignoniaceae): पश्चिमी राजस्थान का राज्य पुष्प; शुष्क रेतीली भूमि हेतु उत्तम; नक्काशीदार फर्नीचर काष्ठ।
  • 5. नीम (Neem — Azadirachta indica, कुल: Meliaceae): अल्पकालिक जीवन क्षमता वाले (Recalcitrant) बीज (जुलाई में पकते ही तुरंत बुवाई); पाला-संवेदनशील (Frost-sensitive); कीटनाशक (Azadirachtin), तेल, चारा व काष्ठ।
  • 6. पॉपलर (Poplar — Populus deltoides, कुल: Salicaceae): 28°N अक्षांश से उत्तर (पंजाब, हरियाणा, तराई उ.प्र.) में उपयुक्त; शीतकालीन पर्णपाती; शाखा कलम (Stem cuttings 20–22 cm) से प्रवर्धन; 6–8 वर्ष का छोटा चक्र।

3. राजस्थान में चारागाह प्रणाली (Pasture System in Rajasthan)

दाबड़घाव एवं शंकरनारायण (Dabadghao & Shankarnarayan, 1973) के भारतीय घासभूमि वर्गीकरण के अनुसार पूरा पश्चिमी और मध्य राजस्थान ‘लैसीयूरस-सेंक्रस-डाइकैंथियम’ (Lasiurus – Cenchrus – Dichanthium) घास आवरण के अंतर्गत आता है। राजस्थान की चारागाह प्रणाली के मुख्य घटक निम्नलिखित हैं:

1. सेवण घास (Sewan Grass — Lasiurus sindicus)

• इसे ‘मरुस्थलीय घासों का राजा’ (King of Desert Grasses) कहा जाता है।
• क्षेत्र: अत्यंत कम वर्षा (100 से 250 mm) वाले पश्चिमी राजस्थान (जैसलमेर के लाठी सीरीज क्षेत्र, बाड़मेर, बीकानेर) की रेतीली भूमि के लिए सर्वोत्तम बहुवर्षीय घास।
• गुण: अत्यंत सूखा प्रतिरोधी, दुधारू गायों (थारपारकर, राठी) के लिए अत्यधिक स्वादिष्ट एवं पौष्टिक (प्रारंभिक अवस्था में 8–12% क्रूड प्रोटीन), एक बार लगने पर 10–15 वर्ष तक चारा देती है।

2. धामण एवं अंजन घास (Dhaman & Anjan Grass)

• धामण घास (Birdwood grass — Cenchrus setigerus): 200–450 mm वर्षा वाले शुष्क व अर्ध-शुष्क क्षेत्रों (जोधपुर, नागौर, पाली, जालौर) की प्रमुख घास; भेड़ व गायों के लिए उत्तम।
• अंजन घास / भूरट (Buffel grass — Cenchrus ciliaris): 250–500 mm वर्षा वाले रेतीले दोमट क्षेत्रों के लिए सर्वाधिक अनुकूल; सिल्वा-पाश्चर और हॉर्टी-पाश्चर (बेर + अंजन) में सर्वाधिक प्रयुक्त।

3. करड़ एवं ग्रामणा घास (Karad & Gramna Grass)

• करड़ / मार्वल घास (Marvel grass — Dichanthium annulatum): अपेक्षाकृत अधिक वर्षा (350–750 mm) और भारी दोमट मृदा वाले पूर्वी व दक्षिणी राजस्थान (कोटा, उदयपुर, जयपुर, भरतपुर) की सर्वोत्तम मीठी घास।
• ग्रामणा घास (Blue Panic — Panicum antidotale) एवं मुरट (Panicum turgidum): बालू के टीलों को बाँधने और चारे के लिए उपयोगी।

4. सिल्वा-पाश्चर एवं ओरण/गोचर/बीड़ तंत्र (Traditional Pasture Systems)

• खेजड़ी + झड़बेरी (पाला) + सेवण/अंजन प्रणाली: यह राजस्थान की पारंपरिक 3-स्तरीय (Three-tier) सिल्वा-पाश्चर प्रणाली है जिसमें ऊपरी स्तर पर खेजड़ी (‘लूंग’), मध्यम स्तर पर झड़बेरी/बोरड़ी (‘पाला’) और निचले स्तर पर सेवण/धामण घास होती है।
• ओरण, गोचर और बीड़: जैसलमेर, बाड़मेर व जोधपुर में ‘ओरण’ तथा शेखावाटी (सीकर, झुंझुनू, चूरू) में ‘बीड़’ या ‘जोड़’ सामुदायिक चारागाह के पारंपरिक उदाहरण हैं।

4. राजस्थान में चारागाह सुधार एवं वैज्ञानिक चराई प्रबंधन (Pasture Improvement & Grazing Management)

  • पुनर्बीजारोपण एवं पेलेटिंग (Reseeding with Grass Pellets): मानसून से पूर्व सेवण या अंजन घास के बीजों को चिकनी मिट्टी, गोबर की खाद और रेत (3:1:1) की गोलियों (Seed pellets) में लपेटकर 50–75 cm कतार अंतराल पर बोया जाता है (बीज दर: 4–6 kg/ha)।
  • दलहनी चारे का समावेश (Legume Introduction): घास की प्रोटीन गुणवत्ता बढ़ाने के लिए बीच में मोंठ, ग्वार, लोबिया या स्टाइलो (Stylosanthes hamata) व सिरैटो (Macroptilium atropurpureum) मिलाया जाता है।
  • वैज्ञानिक चराई प्रणालियाँ (Grazing Systems): (1) निरंतर चराई (Continuous grazing) सबसे हानिकारक है; इसके स्थान पर (2) घूर्णी चराई (Rotational grazing) — चारागाह को 4 पैडॉक में बाँटकर क्रमवार चराना, और (3) आस्थगित-घूर्णी चराई (Deferred-rotational grazing) — हर वर्ष एक खंड को बीज पकने तक चराई से बंद रखना, सर्वोत्तम है।

06 प्रकार एवं वैज्ञानिक वर्गीकरण (Types and Classification)

राजस्थान की चारागाह प्रणालियों एवं चराई विधियों का वर्गीकरण:

  • वर्षा आधारित घास क्षेत्र (Grass Zones of Rajasthan): (1) <250 mm अत्यधिक शुष्क: Lasiurus sindicus (सेवण) जोन, (2) 250–450 mm अर्ध-शुष्क: Cenchrus ciliaris / C. setigerus (अंजन/धामण) जोन, और (3) >450 mm उप-आर्द्र: Dichanthium annulatum (करड़) जोन।
  • चराई प्रणालियाँ (Grazing Systems): (1) Continuous grazing, (2) Rotational grazing, (3) Deferred grazing, (4) Deferred-rotational grazing, और (5) Zero grazing / Cut-and-carry (Stall feeding)।

07 महत्वपूर्ण सिद्धांत एवं समीकरण (Important Principles and Concepts)

  • वहन क्षमता का सिद्धांत (Carrying Capacity Principle in Pastures): किसी चारागाह की वहन क्षमता (Carrying capacity) प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष बिना चारागाह के निम्नीकरण के पाले जा सकने वाले वयस्क पशु इकाइयों (Adult Cattle Units – ACU; 1 ACU = 350 kg भार की गाय जिसे ~7 टन शुष्क/हरा चारा प्रतिवर्ष चाहिए) की अधिकतम संख्या है। भारत में चराई दबाव बहुत अधिक (12.6 ACU/ha, जबकि आदर्श क्षमता ~0.8 से 2 ACU/ha) है, जिसे सिल्वा-पाश्चर द्वारा सुधारा जाता है।

08 वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक उदाहरण व गणनाएँ (Scientific & Practical Examples)

व्यावहारिक उदाहरण: CAZRI जोधपुर का उन्नत सिल्वा-पाश्चर मॉडल

CAZRI (जोधपुर) के अनुसंधान के अनुसार केवल प्राकृतिक चारागाह से प्रतिवर्ष मात्र 0.5–1.0 टन/हेक्टेयर सूखा चारा मिलता है। यदि उसमें खेजड़ी (Prosopis cineraria) या हरड़ू/अंजन वृक्ष (Hardwickia binata) + झड़बेरी (Ziziphus nummularia) + सेवण/धामण घास (Lasiurus sindicus / Cenchrus setigerus) का त्रि-स्तरीय सिल्वा-पाश्चर स्थापित किया जाए, तो कुल चारा उत्पादन बढ़कर 3.5 से 4.5 टन शुष्क पदार्थ/हेक्टेयर/वर्ष हो जाता है और सूखे के वर्ष में भी पशुओं को लूंग व पाला मिलता रहता है।

09 तुलनात्मक सारणियाँ (Comparative Tables)

तुलनात्मक सारणी 8.1: राजस्थान के चारागाहों की प्रमुख बहुवर्षीय घासें एवं झाड़ियाँ
स्थानीय नाम (Local Name) वानस्पतिक नाम (Botanical Name) उपयुक्त वर्षा क्षेत्र प्रमुख विशेषता एवं चारा महत्व
1. सेवण घास (Sewan) Lasiurus sindicus 100 – 250 mm (जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर) ‘मरुस्थलीय घासों का राजा’; अत्यंत सूखा-सहनशील, दुधारू पशुओं हेतु सर्वोत्तम (8–12% CP)।
2. धामण घास (Dhaman) Cenchrus setigerus 200 – 450 mm (जोधपुर, पाली, नागौर) शुष्क व अर्ध-शुष्क चारागाहों की प्रमुख पौष्टिक घास; भेड़ व मवेशियों को अत्यंत प्रिय।
3. अंजन घास (Anjan / Buffel) Cenchrus ciliaris 250 – 500 mm (रेतीली दोमट भूमि) सिल्वा-पाश्चर एवं बेर आधारित हॉर्टी-पाश्चर (Ber + Cenchrus) के लिए सर्वोत्तम।
4. करड़ घास (Karad / Marvel) Dichanthium annulatum 350 – 750 mm (पूर्वी व दक्षिणी राजस्थान) भारी व नमी वाली मृदाओं की उच्च गुणवत्ता वाली मीठी चारागाह घास।
5. ग्रामणा (Blue Panic) Panicum antidotale 250 – 500 mm बालू के टीलों व मेड़ों के स्थिरीकरण और हरे चारे के लिए उपयुक्त।
6. झड़बेरी / बोरड़ी (Pala) Ziziphus nummularia 150 – 500 mm (संपूर्ण शुष्क राजस्थान) सूखी पत्तियों का चारा ‘पाला’ (~14% CP) कहलाता है; फलों (बोर) व बाड़ हेतु भी उपयोगी।

10 महत्वपूर्ण सूत्र एवं तकनीकी मानक (Formulas & Key Metrics)

महत्वपूर्ण चारागाह एवं सिल्वीकल्चर मानक (Key Pasture & Silviculture Facts)
  • व्युत्पत्ति: Silviculture=Silvi (Forest/Woods)+Culture (Cultivation/Growing)
  • राजस्थान के 4 प्रमुख चारा घास वानस्पतिक नाम:
    • सेवण = Lasiurus sindicus  |  धामण = Cenchrus setigerus  |  अंजन = Cenchrus ciliaris  |  करड़ = Dichanthium annulatum
  • बीज दर (घास पुनर्बीजारोपण): सेवण / अंजन घास = 4 से 6 kg/ha (पेलेटिंग मिश्रण: चिकनी मिट्टी : गोबर खाद : रेत = 3:1:1)
  • अखिल भारतीय चारा फसलों के उपनाम: चारा फसलों का राजा (King of Forage) = बरसीम (Trifolium alexandrinum, ~22% CP)  |  चारा फसलों की रानी (Queen of Forage) = रिजका / लूसर्न (Medicago sativa, 17–25% CP)

11 व्याख्यान-विशिष्ट माइंड मैप (Lecture-Specific Mind Map)

Lecture 08 Mind Map: वन संवर्धन (Silviculture) एवं राजस्थान में चारागाह प्रणाली
  • वन संवर्धन एवं राजस्थान की चारागाह प्रणाली (Silviculture & Pasture System in Rajasthan)
    • वन संवर्धन (Silviculture: वन फसलों को उगाने की कला एवं विज्ञान)
      • Silvics बनाम Silviculture: जीवन इतिहास व स्थल कारकों का अध्ययन (Silvics) बनाम व्यावहारिक संवर्धन (Silviculture)
      • उद्देश्य: आर्थिक प्रजाति नियंत्रण, उच्च घनत्व व गुणवत्ता काष्ठ, छोटा आवर्तन काल, बंजर भूमि वनीकरण
      • प्रमुख वृक्ष: सागवान (Tectona), शीशम (Dalbergia), खेजड़ी (Prosopis), रोहिड़ा (Tecomella), नीम, पॉपलर
    • राजस्थान की चारागाह प्रणाली (Lasiurus–Cenchrus–Dichanthium Cover)
      • प्रमुख मरुस्थलीय घासें: सेवण (Lasiurus sindicus – <250mm), धामण (Cenchrus setigerus), अंजन (Cenchrus ciliaris), करड़ (Dichanthium annulatum), ग्रामणा (Panicum antidotale)
      • 3-स्तरीय सिल्वा-पाश्चर: खेजड़ी (लूंग) + झड़बेरी/बोरड़ी (पाला ~14% CP) + सेवण/अंजन घास
      • सामुदायिक परंपराएँ: ओरण (पवित्र उपवन), गोचर (चराई भूमि) एवं बीड़/जोड़ (शेखावाटी)
    • वैज्ञानिक चारागाह प्रबंधन (Pasture Management)
      • सीड पेलेटिंग द्वारा पुनर्बीजारोपण (4–6 kg/ha) + आस्थगित एवं घूर्णी चराई (Deferred-Rotational Grazing)

12 प्रक्रिया प्रवाह चित्र एवं आरेख (Flowcharts & Visual Diagrams)

प्रक्रिया प्रवाह चित्र (Process Flowchart): राजस्थान में निम्नीकृत चारागाह (गोचर/बीड़) के वैज्ञानिक पुनरुद्धार के चरण
1. सुरक्षा एवं बाड़बंदी
(अनियंत्रित चराई रोकथाम व खाई/फेंसिंग)
➔ 2. झाड़ी सफाई व नमी संरक्षण
(अवांछित खरपतवार हटाना व समोच्च कुंड)
➔ 3. घास सीड पेलेट बुवाई
(सेवण/धामण/अंजन 4–6 kg/ha + स्टाइलो)
➔ 4. चारा वृक्ष रोपण (10×10 m)
(खेजड़ी, अर्डू, बोरड़ी/पाला सिल्वा-पाश्चर)
➔ 5. आस्थगित-घूर्णी चराई
(Deferred-Rotational Grazing: 4 गुना उपज)

13 महत्वपूर्ण तथ्य एवं परीक्षा टिप्स (Important Facts & Exam Tips)

  • राजस्थान की चारों प्रमुख घासों के वानस्पतिक नाम कंठस्थ कर लें—ये हर परीक्षा में पूछे जाते हैं: (1) सेवण घास = Lasiurus sindicus, (2) धामण घास = Cenchrus setigerus, (3) अंजन घास = Cenchrus ciliaris, और (4) करड़ घास = Dichanthium annulatum।
  • झड़बेरी / बोरड़ी (Ziziphus nummularia) की सूखी पत्तियों के पौष्टिक चारे को राजस्थान में ‘पाला’ (Pala) और खेजड़ी (Prosopis cineraria) की पत्तियों के चारे को ‘लूंग’ (Loomg) कहते हैं।
  • ‘सिल्विक्स’ (Silvics) वन वृक्षों के जीवन इतिहास और पर्यावरणीय कारकों का अध्ययन है, जबकि ‘सिल्वीकल्चर’ (Silviculture) उस ज्ञान का वन उगाने में व्यावहारिक अनुप्रयोग है (Silvics is the foundation of Silviculture)।
  • नीम (Azadirachta indica) के बीज अल्पकालिक जीवन क्षमता वाले (Recalcitrant) होते हैं, इसलिए जुलाई में फल पकने के तुरंत बाद (1–2 सप्ताह के भीतर) उनकी बुवाई कर देनी चाहिए।
  • बरसीम (Trifolium alexandrinum) को ‘चारा फसलों का राजा’ (King of Fodder Crops) और रिजका/लूसर्न (Medicago sativa) को ‘चारा फसलों की रानी’ (Queen of Fodder Crops) कहा जाता है।

14 त्वरित पुनरावृत्ति सारांश (Quick Revision Panel)

  • Silviculture: वन फसलों की स्थापना, विकास, देखभाल व पुनरुत्पादन की कला एवं विज्ञान।
  • राजस्थान घास कवर: Lasiurus – Cenchrus – Dichanthium प्रकार।
  • प्रमुख घासें: सेवण (Lasiurus sindicus), धामण (Cenchrus setigerus), अंजन (Cenchrus ciliaris), करड़ (Dichanthium annulatum), ग्रामणा (Panicum antidotale)।
  • पवित्र एवं सामुदायिक चारागाह: ओरण (Sacred groves), गोचर, बीड़ / जोड़।

15 बहुविकल्पीय प्रश्न — उत्तर एवं व्याख्या सहित (10 MCQs with Answers)

1. पश्चिमी राजस्थान (जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर) के अत्यंत शुष्क क्षेत्रों की सुप्रसिद्ध ‘सेवण घास’ (King of Desert Grasses) का वानस्पतिक नाम क्या है?
(A) Cenchrus ciliaris
(B) Cenchrus setigerus
(C) Lasiurus sindicus
(D) Dichanthium annulatum
उत्तर एवं व्याख्या देखें (Show Answer & Explanation)
सही उत्तर (Answer): (C) Lasiurus sindicus
वैज्ञानिक व्याख्या (Explanation): सेवण घास का वानस्पतिक नाम Lasiurus sindicus है, जबकि धामण का Cenchrus setigerus, अंजन का Cenchrus ciliaris और करड़ का Dichanthium annulatum है।
2. ‘धामण घास’ (Dhaman grass) और ‘अंजन घास’ (Anjan grass) के वानस्पतिक नाम क्रमशः क्या हैं?
(A) Cenchrus setigerus और Cenchrus ciliaris
(B) Panicum antidotale और Lasiurus sindicus
(C) Cynodon dactylon और Sorghum halepense
(D) Dichanthium annulatum और Pennisetum purpureum
उत्तर एवं व्याख्या देखें (Show Answer & Explanation)
सही उत्तर (Answer): (A) Cenchrus setigerus और Cenchrus ciliaris
वैज्ञानिक व्याख्या (Explanation): धामण घास Cenchrus setigerus (Birdwood grass) है और अंजन घास Cenchrus ciliaris (Buffel grass) है।
3. वन वृक्षों के जीवन इतिहास और सामान्य विशेषताओं का स्थल कारकों (Site factors) के संदर्भ में वैज्ञानिक अध्ययन क्या कहलाता है, जो सिल्वीकल्चर का आधार है?
(A) सिल्विक्स (Silvics)
(B) मेन्सुरेशन (Mensuration)
(C) डेंड्रोलॉजी (Dendrology)
(D) एग्रोनॉमी (Agronomy)
उत्तर एवं व्याख्या देखें (Show Answer & Explanation)
सही उत्तर (Answer): (A) सिल्विक्स (Silvics)
वैज्ञानिक व्याख्या (Explanation): सिल्विक्स (Silvics) वृक्षों के जीवन इतिहास और पर्यावरण के साथ उनके संबंध का अध्ययन है, और इसके व्यावहारिक अनुप्रयोग को सिल्वीकल्चर कहते हैं।
4. राजस्थान के शुष्क चारागाहों में पाई जाने वाली किस बहुवर्षीय झाड़ी की सूखी पत्तियों को ‘पाला’ (Pala – ~14% प्रोटीन चारा) कहा जाता है?
(A) आक (Calotropis procera)
(B) झड़बेरी / बोरड़ी (Ziziphus nummularia)
(C) खींप (Crotalaria burhia)
(D) फोग (Calligonum polygonoides)
उत्तर एवं व्याख्या देखें (Show Answer & Explanation)
सही उत्तर (Answer): (B) झड़बेरी / बोरड़ी (Ziziphus nummularia)
वैज्ञानिक व्याख्या (Explanation): झड़बेरी या बोरड़ी (Ziziphus nummularia) की पत्तियों के पौष्टिक चारे को ‘पाला’ कहा जाता है।
5. राजस्थान में स्थानीय लोक देवी/देवता को समर्पित उन पारंपरिक सामुदायिक वनों एवं चारागाहों को क्या कहा जाता है जहाँ हरी लकड़ी काटना धार्मिक रूप से वर्जित होता है?
(A) तौंग्या
(B) ओरण (Oran)
(C) झूम
(D) कांगायम
उत्तर एवं व्याख्या देखें (Show Answer & Explanation)
सही उत्तर (Answer): (B) ओरण (Oran)
वैज्ञानिक व्याख्या (Explanation): राजस्थान में लोक देवताओं को समर्पित पवित्र उपवनों एवं चारागाहों को ‘ओरण’ (Sacred groves) कहा जाता है।
6. पूर्वी और दक्षिणी राजस्थान के अपेक्षाकृत अधिक वर्षा और भारी मृदा वाले क्षेत्रों में पाई जाने वाली प्रमुख मीठी चारागाह घास ‘करड़’ (Marvel grass) का वानस्पतिक नाम क्या है?
(A) Dichanthium annulatum
(B) Lasiurus sindicus
(C) Panicum turgidum
(D) Aristida funiculata
उत्तर एवं व्याख्या देखें (Show Answer & Explanation)
सही उत्तर (Answer): (A) Dichanthium annulatum
वैज्ञानिक व्याख्या (Explanation): करड़ घास का वानस्पतिक नाम Dichanthium annulatum है।
7. चारागाह प्रबंधन की किस चराई प्रणाली में चारागाह को कई खंडों (Paddocks) में बाँटा जाता है और प्रत्येक वर्ष बारी-बारी से एक खंड को घास के बीज पकने और झड़ने तक चराई से बंद रखा जाता है?
(A) अनियंत्रित सतत चराई (Continuous grazing)
(B) आस्थगित-घूर्णी चराई (Deferred-rotational grazing)
(C) ओवर-ग्रेजिंग
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर एवं व्याख्या देखें (Show Answer & Explanation)
सही उत्तर (Answer): (B) आस्थगित-घूर्णी चराई (Deferred-rotational grazing)
वैज्ञानिक व्याख्या (Explanation): आस्थगित-घूर्णी चराई (Deferred-rotational grazing) चारागाह के प्राकृतिक पुनर्जनन और उच्च उत्पादकता के लिए सर्वोत्तम वैज्ञानिक विधि है।
8. निम्नलिखित में से किन दो सिंचित चारा फसलों को क्रमशः ‘चारा फसलों का राजा’ (King of Forage) और ‘चारा फसलों की रानी’ (Queen of Forage) कहा जाता है?
(A) ज्वार और बाजरा
(B) बरसीम (Trifolium alexandrinum) और रिजका/लूसर्न (Medicago sativa)
(C) मक्का और जई
(D) नेपियर और गिनी घास
उत्तर एवं व्याख्या देखें (Show Answer & Explanation)
सही उत्तर (Answer): (B) बरसीम (Trifolium alexandrinum) और रिजका/लूसर्न (Medicago sativa)
वैज्ञानिक व्याख्या (Explanation): बरसीम (22% CP) को ‘King of Forage’ और रिजका/लूसर्न (17–25% CP) को ‘Queen of Forage’ कहा जाता है।
9. किस वृक्ष के बीज अत्यधिक अल्पकालिक जीवन क्षमता वाले (Recalcitrant seeds) होते हैं जिन्हें मानसून (जुलाई) में पकते ही तुरंत नर्सरी में बोना पड़ता है?
(A) नीम (Azadirachta indica)
(B) बबूल (Acacia nilotica)
(C) खेजड़ी (Prosopis cineraria)
(D) सुबबूल (Leucaena leucocephala)
उत्तर एवं व्याख्या देखें (Show Answer & Explanation)
सही उत्तर (Answer): (A) नीम (Azadirachta indica)
वैज्ञानिक व्याख्या (Explanation): नीम के बीजों की जीवन क्षमता (Viability) मात्र 2–3 सप्ताह होती है, इसलिए इन्हें संग्रहण के तुरंत बाद बोया जाता है।
10. दाबड़घाव एवं शंकरनारायण (1973) के अनुसार राजस्थान के शुष्क एवं अर्ध-शुष्क चारागाह किस घास आवरण (Grassland cover) के अंतर्गत आते हैं?
(A) टेमेडा-अरुंडिनेला कवर
(B) लैसीयूरस-सेंक्रस-डाइकैंथियम (Lasiurus–Cenchrus–Dichanthium) कवर
(C) फ्रैग्माइट्स-सैकेरम कवर
(D) अल्पाइन मीडो कवर
उत्तर एवं व्याख्या देखें (Show Answer & Explanation)
सही उत्तर (Answer): (B) लैसीयूरस-सेंक्रस-डाइकैंथियम (Lasiurus–Cenchrus–Dichanthium) कवर
वैज्ञानिक व्याख्या (Explanation): शुष्क व अर्ध-शुष्क पश्चिमी भारत (राजस्थान, गुजरात, हरियाणा) Lasiurus–Cenchrus–Dichanthium घास आवरण में आता है।

16 अति-लघु, लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न व वन-लाइनर्स (Exam Question Bank)

(A) 5 महत्वपूर्ण वन-लाइनर्स (5 Important Exam One-Liners)

  1. सेवण घास (Lasiurus sindicus) को ‘मरुस्थलीय घासों का राजा’ कहा जाता है, जो 100–250 mm वर्षा वाले पश्चिमी राजस्थान में उगती है।
  2. धामण घास का वानस्पतिक नाम Cenchrus setigerus, अंजन का Cenchrus ciliaris और करड़ का Dichanthium annulatum है।
  3. झड़बेरी / बोरड़ी (Ziziphus nummularia) की सूखी पत्तियों के पौष्टिक चारे को ‘पाला’ (~14% क्रूड प्रोटीन) कहते हैं।
  4. बरसीम (Trifolium alexandrinum) को ‘चारा फसलों का राजा’ और रिजका (Medicago sativa) को ‘चारा फसलों की रानी’ कहते हैं।
  5. वन वृक्षों के जीवन इतिहास व पर्यावरणीय संबंधों के अध्ययन को ‘सिल्विक्स’ (Silvics) और वन उगाने की कला व विज्ञान को ‘सिल्वीकल्चर’ कहते हैं।

(B) 5 अति-लघु उत्तरीय प्रश्न (5 Very Short Answer Questions)

1. ‘Silviculture’ शब्द की उत्पत्ति किन लैटिन शब्दों से हुई है?
उत्तर: लैटिन शब्द ‘Silvi’ (अर्थात् वन/Forest) और ‘Culture’ (अर्थात् संवर्धन या उगाना/Growing) से।
2. राजस्थान की चार प्रमुख बहुवर्षीय चारागाह घासों के वानस्पतिक नाम लिखिए।
उत्तर: (1) सेवण: Lasiurus sindicus, (2) धामण: Cenchrus setigerus, (3) अंजन: Cenchrus ciliaris, और (4) करड़: Dichanthium annulatum।
3. शेखावाटी क्षेत्र (सीकर, झुंझुनू, चूरू) में संरक्षित चारागाह भूमि को स्थानीय भाषा में क्या कहते हैं?
उत्तर: ‘बीड़’ (Beed) या ‘जोड़’ (Jorh)।
4. ग्रामणा घास (Blue Panic) और मुरट घास का वानस्पतिक नाम लिखिए।
उत्तर: ग्रामणा: Panicum antidotale; मुरट: Panicum turgidum।
5. भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र के कितने प्रतिशत भाग पर स्थायी चारागाह (Permanent pastures) हैं और राजस्थान में यह कितना है?
उत्तर: भारत में लगभग 3.60% (10.90 Mha) तथा राजस्थान में लगभग 5.39%।

(C) 5 लघु उत्तरीय प्रश्न (5 Short Answer Questions)

1. वन संवर्धन (Silviculture) को परिभाषित कीजिए तथा इसके छह प्रमुख उद्देश्य लिखिए।
उत्तर: वन फसलों को उगाने, स्थापित करने और उनकी देखभाल व पुनरुत्पादन करने की कला और विज्ञान को वन संवर्धन (Silviculture) कहते हैं। उद्देश्य: (1) आर्थिक मूल्य की प्रजातियों का नियंत्रण, (2) इष्टतम पौध घनत्व द्वारा अधिकतम काष्ठ आयतन उत्पादन, (3) प्रूनिंग व थिनिंग द्वारा उच्च गुणवत्ता की गाँठ-मुक्त लकड़ी तैयार करना, (4) आवर्तन काल (Rotation period) को छोटा करना, (5) बंजर व निम्नीकृत भूमियों का वनीकरण, और (6) प्राकृतिक पुनर्जनन सुनिश्चित करना।
2. सिल्विक्स (Silvics) और सिल्वीकल्चर (Silviculture) में क्या अंतर है?
उत्तर: सिल्विक्स (Silvics) वन वृक्षों के जीवन इतिहास, वृद्धि स्वभाव और पर्यावरणीय स्थल कारकों (प्रकाश, ताप, मृदा, नमी) के प्रभाव का मौलिक वैज्ञानिक अध्ययन है। इसके विपरीत, सिल्वीकल्चर (Silviculture) सिल्विक्स से प्राप्त वैज्ञानिक ज्ञान को व्यवहार में लाकर वन फसलों की स्थापना, टेंडिंग और पुनर्जनन करने की अनुप्रयुक्त कला और विज्ञान है। संक्षेप में, सिल्विक्स सिद्धांत है और सिल्वीकल्चर उसका अभ्यास है।
3. राजस्थान की पारंपरिक 3-स्तरीय (Three-tier) सिल्वा-पाश्चर प्रणाली और ‘ओरण/गोचर’ के महत्व को समझाइए।
उत्तर: राजस्थान की पारंपरिक त्रि-स्तरीय सिल्वा-पाश्चर प्रणाली में सबसे ऊपरी स्तर पर खेजड़ी (Prosopis cineraria — जिससे ‘लूंग’ चारा मिलता है), मध्यम स्तर पर झड़बेरी/बोरड़ी (Ziziphus nummularia — जिससे ~14% प्रोटीन वाला ‘पाला’ चारा मिलता है) और निचले स्तर पर सेवण (Lasiurus sindicus) या धामण/अंजन घास होती है। इसके अलावा गाँवों में लोक देवताओं को समर्पित ‘ओरण’ और पंचायत के ‘गोचर/बीड़’ अकाल के समय पशुधन को बचाने और मरुस्थलीय जैव-विविधता संरक्षित रखने में मुख्य भूमिका निभाते हैं।
4. राजस्थान की प्रमुख चारागाह घासों—सेवण, धामण, अंजन और करड़—की वर्षा मांग और विशेषताओं की तुलना कीजिए।
उत्तर: (1) सेवण (Lasiurus sindicus): 100–250 mm वर्षा वाले जैसलमेर-बाड़मेर-बीकानेर की रेतीली भूमि हेतु ‘मरुस्थलीय घासों का राजा’; (2) धामण (Cenchrus setigerus): 200–450 mm वर्षा वाले जोधपुर-नागौर-पाली क्षेत्र हेतु; (3) अंजन (Cenchrus ciliaris): 250–500 mm वर्षा में बेर व वृक्षों के साथ सिल्वा-पाश्चर हेतु सर्वोत्तम; और (4) करड़ (Dichanthium annulatum): 350–750 mm वर्षा वाले पूर्वी/दक्षिणी राजस्थान की भारी मिट्टी हेतु उत्तम घास।
5. राजस्थान के निम्नीकृत चारागाहों के सुधार के लिए वैज्ञानिक उपाय लिखिए।
उत्तर: (1) कंटीले तार या खाई (Trench-cum-mound) से बाड़बंदी कर अनियंत्रित चराई रोकना, (2) समोच्च कुंड (Contour furrows) बनाकर नमी संरक्षण करना, (3) सेवण/अंजन घास के बीजों की मिट्टी व गोबर की गोलियाँ (Seed pellets) बनाकर 4–6 kg/ha की दर से बुवाई करना, (4) स्टाइलो या मोठ/ग्वार जैसे दलहनी चारे व खेजड़ी/अर्डू वृक्ष लगाना, और (5) आस्थगित-घूर्णी चराई (Deferred-rotational grazing) लागू करना।

(D) 3 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (3 Long Answer Questions)

1. राजस्थान में चारागाह प्रणाली (Pasture System in Rajasthan) पर एक विस्तृत निबंध लिखिए, जिसमें प्रमुख मरुस्थलीय घासों (सेवण, धामण, अंजन, करड़, ग्रामणा), झाड़ी चारे (पाला), ओरण/गोचर परंपरा तथा वैज्ञानिक चराई प्रबंधन का वर्णन हो।
उत्तर रूपरेखा एवं मुख्य बिंदु: Lasiurus–Cenchrus–Dichanthium घास आवरण का उल्लेख करते हुए सारणी 8.1 की सभी घासों के वानस्पतिक नाम, वर्षा क्षेत्र, खेजड़ी-बोरड़ी-सेवण त्रि-स्तरीय मॉडल, ओरण/गोचर/बीड़ परंपरा और सीड पेलेटिंग व आस्थगित-घूर्णी चराई का पूर्ण विवरण प्रस्तुत करें।
2. वन संवर्धन (Silviculture) को परिभाषित कीजिए। सिल्विक्स के साथ इसके संबंध, उद्देश्यों, कार्यक्षेत्र तथा भारत व राजस्थान की 6 प्रमुख वानिकी वृक्ष प्रजातियों (सागवान, शीशम, खेजड़ी, रोहिड़ा, नीम, पॉपलर) की संवर्धन विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर रूपरेखा एवं मुख्य बिंदु: Toumey & Korstian तथा Champion & Seth की परिभाषाएँ, Silvics बनाम Silviculture, 6 मुख्य उद्देश्य और प्रमुख वृक्ष प्रजातियों के वानस्पतिक नाम, कुल, जलवायु मांग व प्रवर्धन विधियों का विस्तार से वर्णन करें।
3. भारत में चारे की मांग और आपूर्ति के अंतर (Fodder deficit) को पाटने में सिल्वा-पाश्चर प्रणाली (Silvi-pastoral system) और चारा वृक्षों (Top feed trees) के योगदान का वैज्ञानिक विश्लेषण कीजिए।
उत्तर रूपरेखा एवं मुख्य बिंदु: भारत में पशुधन संख्या (535.78 मिलियन), उच्च चराई दबाव (12.6 ACU/ha), दलहनी चारा वृक्षों के उच्च क्रूड प्रोटीन (21.91% CP) और बंजर भूमि पर सिल्वा-पाश्चर द्वारा चारा उत्पादन 0.5 t/ha से बढ़ाकर 4.5 t/ha करने की कार्यप्रणाली समझाएँ।

आधार: उपयोगकर्ता द्वारा उपलब्ध AGF 311 notes।

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